चंद्रशेखर रावण की धमाकेदार एंट्री
भारतीय राजनीति में समय-समय पर कई ऐसे क्षण आते हैं जब कोई नया चेहरा जनता के बीच उम्मीदों की किरण बनकर उभरता है। आजादी के अमृतकाल में देश जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें दलित-पिछड़े और वंचित वर्गों की आवाज पहले से कहीं अधिक बुलंद हो रही है। इसी पृष्ठभूमि में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ की राजनीति में धमाकेदार एंट्री ने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
जनता का सैलाब और उमड़ी भीड़
उनकी सभा स्थल पर लोगों की इतनी भीड़ उमड़ी कि हर तरफ नीले झंडों और नारों की गूंज सुनाई दी। भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने “जय भीम” और “चंद्रशेखर जिंदाबाद” के नारों से पूरा माहौल गूंजा दिया। गाँव-गाँव, गली-गली से हजारों की संख्या में नौजवान, महिलाएँ और बुजुर्ग इस ऐतिहासिक एंट्री के गवाह बने।
राजनीतिक हलचल
चंद्रशेखर रावण की एंट्री ने यूपी की राजनीति में भूचाल ला दिया है। लंबे समय से समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी जैसे दल दलित-पिछड़े और युवाओं को साधने की रणनीति बनाते रहे हैं। मगर रावण की बढ़ती लोकप्रियता ने समीकरण बदल दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका उभार परंपरागत वोट बैंक को प्रभावित करेगा और यह आने वाले चुनाव में “किंगमेकर” की भूमिका निभा सकता है।
युवाओं की उम्मीद
रावण को खासकर युवाओं का भरपूर समर्थन मिल रहा है। बेरोजगारी, शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर उनकी स्पष्ट और आक्रामक आवाज ने युवाओं में विश्वास जगाया है। उनकी एंट्री ने यह साबित कर दिया कि अब युवाओं की राजनीति में नई दिशा और नई ऊर्जा देखने को मिलेगी।
विरोधियों की चिंता
जहाँ समर्थक उनकी एंट्री को “क्रांति की शुरुआत” मान रहे हैं, वहीं विरोधी खेमों में चिंता की लहर दौड़ गई है। पारंपरिक दलों को यह डर सता रहा है कि उनकी पकड़ कमजोर न पड़ जाए। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि चंद्रशेखर रावण की यह एंट्री किसी बड़े परिवर्तन की प्रस्तावना हो सकती है।
संघर्ष से नेतृत्व तक
चंद्रशेखर रावण ने अपने संघर्ष और जेल यात्रा के दौरान ही जनता में पहचान बना ली थी। सहारनपुर हिंसा के बाद उन्होंने जिस तरह से दलित समाज और गरीब वर्गों के मुद्दे उठाए, उससे वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गए। यही कारण है कि उनकी धमाकेदार एंट्री को केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि पूरे वंचित समाज की जीत माना जा रहा है।
भविष्य की राजनीति
विशेषज्ञ मानते हैं कि चंद्रशेखर रावण की यह एंट्री आने वाले वर्षों की राजनीति में निर्णायक होगी। यदि वे अपनी रणनीति और जनसमर्थन को बरकरार रखते हैं तो वे राष्ट्रीय स्तर पर दलित-पिछड़ा और युवा राजनीति का चेहरा बन सकते हैं।