हसनपुर स्टेट का गौरवशाली उदय: सुल्तानपुर से कैसे बनी विशाल रियासत?
हसनपुर स्टेट की कहानी 18वीं शताब्दी से शुरू होती है, लेकिन इसकी जड़ें और गहरी हैं। सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) के हसनपुर गांव में ठाकुर परिवार ने अपनी जड़ें जमाईं। संस्थापक से जुड़े ठाकुर हसन सिंह या हसन खान जैसे नाम मुगल काल के अंतिम दिनों में स्थानीय जंगलों और खेतों पर कब्जा कर रियासत की नींव रखते हैं। कुशल कूटनीति, वैवाहिक संबंधों और योद्धा प्रवृत्ति से रियासत का विस्तार हुआ। 19वीं शताब्दी के मध्य तक यह सुल्तानपुर से पूर्वी दिशा में फैलकर बिहार की सीमा तक पहुंच गई, गया जिले को प्रभावित करते हुए। कुल 450 किलोमीटर लंबी यह रियासत करीब 500 गांवों पर फैली थी, जहां जमींदारों का राज चलता था। ब्रिटिश दस्तावेजों में इसे ‘हसनपुर जागीर’ कहा गया, जो राजस्व और सैन्य सहायता प्रदान करती थी।
450 किमी रियासत का स्वर्णिम काल: जमींदारों की शानो-शौकत और सांस्कृतिक विरासत
20वीं शताब्दी की शुरुआत में हसनपुर स्टेट चरम पर थी। महाराजा रघुनाथ सिंह जैसे शासकों के समय 50 हजार एकड़ से अधिक भूमि पर कब्जा था। सुल्तानपुर में मुख्य महल ‘हसनपुर हवेली’ संगमरमर और नक्काशी से सजी थी। गया तक फैली रियासत में रामगढ़ किला, ठाकुरगढ़ जैसे दर्जनों किले थे। जमींदारों का जीवन राजसी था—हाथी, घोड़े, स्वर्णाभूषण और भव्य उत्सव। सांस्कृतिक रूप से रामलीला, होली, दीवाली प्रसिद्ध थे। लोकगीतों में वीरता की कहानियां गाई जाती थीं। शिक्षा में गया में संस्कृत पाठशाला और सुल्तानपुर में स्कूल स्थापित हुए। ब्रिटिश सिमला एग्रीमेंट से ‘प्रिवेट एस्टेट’ दर्जा मिला, करों में छूट मिली। जनसंख्या लाखों में थी, पूर्वांचल का आर्थिक केंद्र बनी।
प्रमुख जमींदार और उनके योगदान
- ठाकुर हसन सिंह / हसन खान: संस्थापक, मुगल जागीर से शुरुआत, शेरशाह सूरी से निकटता।
- महाराजा रघुनाथ सिंह: विस्तारकर्ता, 450 किमी सीमा स्थापित।
- राजा विक्रमादित्य / अन्य वारिस: स्वतंत्रता पूर्व अंतिम शासक, सामाजिक सुधार।
रियासत पृथ्वीराज चौहान के वंशजों से जुड़ी मानी जाती है, जहां त्रिलोकचंद्र ने इस्लाम अपनाया।
हसनपुर स्टेट का पतन: स्वतंत्र भारत में कैसे सिमटी रियासत कुछ बिस्वा में?
1947 की आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन अधिनियम 1950 (यूपी) और
1951 (बिहार) ने रियासत की जड़ें काट दीं। सरकार ने 90% भूमि जब्त कर भूमिहीनों में बांटी।
सुल्तानपुर से गया तक फैली 450 किमी रियासत मुख्य हवेली और
कुछ बिस्वा जमीन पर सिमट गई। कानूनी लड़ाइयां चलीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1960 में फैसला दिया।
आज हसनपुर गांव में पुरानी हवेली जर्जर है, पर्यटकों को आकर्षित करती है लेकिन रखरखाव की कमी है।
वर्तमान वारिस ठाकुर परिवार छोटे व्यापार करते हैं। पर्यावरण बदलाव,
शहरीकरण ने बची जमीन प्रभावित की। लोककथाओं में गाथा जीवित है।
आज की हसनपुर स्टेट: विरासत संरक्षण और पर्यटन की संभावनाएं
वर्तमान में कुछ बिस्वा में सिमटी हसनपुर स्टेट का ऐतिहासिक महत्व असीम है।
यूपी पर्यटन विभाग ने हेरिटेज साइट घोषित करने की योजना बनाई है।
सुल्तानपुर-गया हाईवे पर स्थित होने से टूरिस्ट स्पॉट बन सकता है।
स्थानीय लोग ‘हसनपुर स्टेट म्यूजियम’ की मांग कर रहे हैं।
यह कहानी उदय-पतन के चक्र को सिखाती है, जहां शक्ति, समृद्धि और बदलाव एक साथ चलते हैं।
हसनपुर किला, जहां शेरशाह सूरी और बाबर रुके थे, आज भी इतिहास की गवाही देता है।