उत्तर प्रदेश में उपभोक्ता न्याय व्यवस्था की हालत चिंताजनक हो गई है। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में 5 बेंच होनी चाहिए, लेकिन सिर्फ 1 बेंच काम कर रही है। 15 हजार से अधिक लंबित मामलों में उपभोक्ताओं को सिर्फ तारीख पर तारीख मिल रही है। यह स्थिति उपभोक्ता अधिकारों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। कई मामले सालों से लंबित हैं और उपभोक्ता न्याय से वंचित हो रहे हैं। कमीशन में अध्यक्ष और सदस्यों की कमी मुख्य वजह है। यह समस्या सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं, लेकिन यहां हालात सबसे खराब हैं। उपभोक्ता परेशान हैं और कंपनियां फायदा उठा रही हैं।
आयोग की वर्तमान स्थिति: सिर्फ 1 बेंच काम कर रही
यूपी राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में:
- कुल 5 बेंच होनी चाहिए।
- वर्तमान में सिर्फ 1 बेंच सक्रिय।
- अध्यक्ष और सदस्यों की कमी।
- कई बेंच खाली पड़ी हैं।
- सुनवाई की गति धीमी।
यह कमीशन लखनऊ में है और पूरे राज्य के बड़े मामलों की सुनवाई करता है।
15 हजार लंबित मामले: तारीख पर तारीख
आयोग में 15 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। मुख्य समस्या:
- छोटे-बड़े उपभोक्ता विवाद।
- सालों से सुनवाई नहीं।
- उपभोक्ता थक हारकर केस छोड़ देते हैं।
- कंपनियां फायदा उठाती हैं।
- न्याय में देरी, न्याय से वंचित।
उपभोक्ता कहते हैं, “शिकायत की लेकिन सालों से तारीख मिल रही है।”
कमी के मुख्य कारण: सदस्यों की नियुक्ति में देरी
यह हालत क्यों बनी:
- अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं।
- सरकार और कोर्ट में देरी।
- योग्य उम्मीदवारों की कमी।
- राजनीतिक और प्रशासनिक कारण।
- बजट और इंफ्रा की समस्या।
यह कमी सालों से चली आ रही है।
उपभोक्ताओं पर प्रभाव: न्याय से वंचित
यह स्थिति उपभोक्ताओं के लिए परेशानी है:
- पैसे फंसे रहते हैं।
- कंपनियां जवाबदेही से बचती हैं।
- छोटे उपभोक्ता सबसे प्रभावित।
- विश्वास कम होता है।
- ब्लैक मार्केटिंग बढ़ती है।
उपभोक्ता अधिकारों का हनन हो रहा है।
समाधान के सुझाव: जल्द नियुक्ति और सुधार
समाधान के लिए:
- अध्यक्ष और सदस्यों की तुरंत नियुक्ति।
- डिजिटल सुनवाई बढ़ाएं।
- जिला स्तर पर कोर्ट मजबूत करें।
- लंबित मामलों का विशेष अभियान।
- उपभोक्ता जागरूकता।
सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए।