ब्रिटिश शासन को भारत छोड़े हुए सात दशक से अधिक बीत चुके हैं, लेकिन आज भी उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारतीय रेलवे सिस्टम के कई हिस्सों पर उन्हीं के बनाए कानून, नियम और कोड हुकूमत चला रहे हैं। खासकर सेंट्रल रेलवे जोन जैसे खंडों में ब्रिटिश काल के तकनीकी और प्रशासनिक ढांचे के निशान गहराई से मौजूद हैं। सरकारी स्तर पर आधुनिकीकरण की कोशिशें कई चरणों में चलीं, परंतु तकनीकी जटिलताओं और प्रणालीगत निर्भरता के कारण यह पुराना ढांचा पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।
रेल मंत्रालय के रिकॉर्ड बताते हैं कि भारतीय रेलवे का सबसे बड़ा कानूनी आधार “इंडियन रेलवे एक्ट 1890” था, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने तैयार किया था। आज उसका स्थान भले ही 1989 के नए रेलवे एक्ट ने ले लिया हो, लेकिन रेल संचालन, सुरक्षा नियमावली, डॉक्यूमेंटेशन और कोड बुक में अब भी उस पुराने ब्रिटिश ढांचे की छाप स्पष्ट झलकती है। स्टेशन मास्टर से लेकर लोको पायलट तक कई विभागों में इस्तेमाल होने वाले ‘कोड्स’ और ‘सिग्नलिंग मैनुअल्स’ ब्रिटिश इंजीनियरों द्वारा तैयार मूल ढांचे के संशोधित रूप ही हैं।
तकनीकी जटिलता और पुरानी निर्भरता
रेलवे इंजीनियरिंग एक अत्यंत जटिल क्षेत्र है। सिग्नलिंग सिस्टम, ब्रेकिंग तकनीक, ट्रैक लेआउट, इंजन डिजाइन और ब्लॉक ऑपरेशन जैसी व्यवस्थाएँ मूल रूप से अंग्रेजों के दौर में बनीं थीं। उस समय ब्रिटिश इंजीनियरों ने जो बुनियादी ढांचा तैयार किया था, वही आज के आधुनिक नेटवर्क का कंकाल बन गया।
समय-समय पर उप-नियम जोड़े गए, परंतु संपूर्ण प्रणाली बदलने का कार्य कभी संभव नहीं हो पाया।रेलवे इंजीनियरिंग सेवा के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि पुराने ब्रिटिश कोड को हटाने का प्रयास कई बार हुआ, लेकिन हर बार तकनीकी चुनौती सामने आ खड़ी होती है। किसी एक विभाग का कोड बदलने पर दूसरे विभाग के श्रृंखलाबद्ध नियमों पर प्रभाव पड़ता है, जिससे पूरा ऑपरेशन बाधित हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, स्टेशन पर उपयोग किए जाने वाले ब्लॉक सिग्नल सिस्टम में 1920 का कोड आज भी मान्य है, क्योंकि इसकी जगह नया कोड लाने के लिए हजारों किलोमीटर नेटवर्क को एक साथ सिंक्रोनाइज करना पड़ेगा, जो व्यावहारिक रूप से कठिन है।
यूपी के सेंट्रल जोन में ब्रिटिश छाप
उत्तर प्रदेश का सेंट्रल जोन कई मायनों में ब्रिटिश युग की इंजीनियरिंग का जीवित उदाहरण है। इलाहाबाद (अब प्रयागराज), लखनऊ, कानपुर और वाराणसी के बीच फैले इस नेटवर्क में जो रेल भवन, पुल और सिग्नल केबिन हैं, वे जॉन लॉरेंस और लॉर्ड डलहौजी काल के डिज़ाइन पर आधारित हैं।
रेलवे की पुरानी ‘रेलवे कोड बुक’ में आज भी अंग्रेजी उप-धाराओं में लिखे कई प्रावधान लागू हैं, जिनका हिंदी अनुवाद करना भी विभागीय चुनौती है।रेलवे कर्मियों का कहना है कि कई टर्म अब भी पुराने अंग्रेजी नामों में प्रचलित हैं, जैसे ‘कैबिन इंटरलॉकिंग’, ‘सेमाफोर सिग्नल’, ‘ब्लॉक इंस्ट्रूमेंट’, ‘रिले रूम’ आदि। ये शब्द और उनके कार्य आज भी पुराने ब्रिटिश पाठ्यक्रम पर आधारित हैं। तकनीकी स्तर पर इन्हें बदलने के लिए जिस भारी निवेश और प्रशिक्षण की जरूरत है, वह आसानी से संभव नहीं।
आधुनिकीकरण की कोशिशें और रोड़े
हाल के सालों में रेलवे ने हजारों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट से सिग्नलिंग और ट्रैक मैनेजमेंट को आधुनिक बनाने की पहल की है। केविन ट्रैक्शन सिस्टम, रेलवे नेट, ई-ऑफिस, और सैटेलाइट आधारित संचार व्यवस्था लाने के बावजूद, पुराने कोड्स की जकड़ बरकरार है। दरअसल हर नए सिस्टम को पुराने नियमों के अनुरूप ढालना पड़ता है, जिससे ब्रिटिश कालीन ढांचे की जड़ें और गहरी हो जाती हैं।
रेलवे बोर्ड ने भी माना है कि 25 से अधिक प्रमुख कोड और मैनुअल्स — जैसे कि जनरल एंड सब्सिडियरी रूल्स (G&SR), सिग्नलिंग एंड इंटरलॉकिंग कोड, पर्मनेंट वे मैनुअल — ब्रिटिश कालीन रूपरेखा पर आधारित हैं। इन्हें पूरी तरह अपडेट करने के लिए पहले नेटवर्क का पूर्ण डिजिटलीकरण और डेटा इंटीग्रेशन आवश्यक है, जो अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य
तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रिटिश कोड की जटिलताएँ रेलवे के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह भी काम कर रही हैं, क्योंकि वे दशकों से परखी हुई प्रणाली हैं। परंतु लंबे समय तक उन पर निर्भर रहने से रेलवे का तकनीकी विकास धीमा पड़ सकता है। भविष्य के लिए भारत को अपने ही एआई-आधारित ऑपरेशन कोड और फुली डिजिटल कंट्रोल सिस्टम तैयार करने होंगे, ताकि प्रबंधन भारतीय तर्क और आवश्यकताओं के अनुरूप हो सके।
सरकार ने हाल ही में ‘मिशन कवच’ और ‘जी-20 रेल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ जैसे प्रयासों के तहत सिग्नल और ऑपरेशन प्रणाली का भारतीयकरण शुरू किया है। उम्मीद है कि अगले दशक तक रेलवे धीरे-धीरे इन ब्रिटिश कोड्स की जंजीरों से मुक्त हो सकेगा। लेकिन अभी के लिए, उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश के रेलवे तंत्र में अंग्रेज़ों के बनाए नियमों की परछाई साफ दिखाई देती है।