एससी-एसटी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: केंद्र से रिपोर्ट मांगी। नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने मंगलवार को SC/ST आरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांगी है कि उस संविधान बेंच के फैसले के बाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के आरक्षण से जुड़ी सिफारिशों पर क्या कार्रवाई की गई है। इस फैसले में कोर्ट ने SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने पर जोर दिया था, साथ ही कोटा के अंदर कोटा बनाने की मंजूरी भी दी थी। यह निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में एक नया मोड़ ला सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। बेंच ने स्पष्ट किया कि 2022 में दिए गए संविधान बेंच के फैसले को लागू करने में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC/ST आरक्षण के लाभ को अधिक योग्य और संपन्न वर्गों तक सीमित न रखा जाए। इसलिए क्रीमी लेयर की अवधारणा को अनुसूचित जाति जनजाति आरक्षण में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचे।
संविधान बेंच का ऐतिहासिक फैसला: कोटा के अंदर कोटा की मंजूरी
2022 में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान बेंच ने SC/ST आरक्षण से जुड़े कई मुद्दों पर फैसला सुनाया था। इस फैसले में कोर्ट ने राज्यों को अनुमति दी कि वे कोटा के अंदर कोटा बना सकते हैं। इसका मतलब है कि एससी और एसटी के आरक्षण को उप-वर्गों में बांटा जा सकता है, ताकि सबसे पिछड़े समुदायों को प्राथमिकता मिले। उदाहरण के लिए, पंजाब सरकार ने पहले ही एससी आरक्षण में इस फॉर्मूले को लागू कर दिया है, जहां 50% एससी कोटा में से 37% सबसे पिछड़े एससी समुदायों के लिए आरक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि क्रीमी लेयर को SC/ST आरक्षण से बाहर किया जाए। सामान्य वर्ग में क्रीमी लेयर की आय सीमा 8 लाख रुपये सालाना है, लेकिन एससी-एसटी के लिए अभी तक कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि संपन्न एससी-एसटी परिवारों को आरक्षण के लाभ से वंचित रखना जरूरी है, ताकि गरीब और वंचित वर्ग मजबूत हो सकें। मंगलवार की सुनवाई में केंद्र सरकार के वकील ने बताया कि इस पर विचार चल रहा है, लेकिन कोर्ट ने असंतोष जताते हुए दो हफ्ते में रिपोर्ट मांगी।
क्रीमी लेयर लागू करने पर जोर: सामाजिक न्याय की नई परिभाषा
SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का मुद्दा लंबे समय से विवादास्पद रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले (1992) में ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान किया था, लेकिन एससी-एसटी पर यह लागू नहीं हुआ। अब संविधान बेंच ने स्पष्ट कहा कि संविधान का अनुच्छेद 335 योग्यता को ध्यान में रखते हुए आरक्षण देता है। कोर्ट का तर्क था कि आरक्षण अनंतकाल तक नहीं चल सकता; इसे जरूरत के आधार पर सीमित रखना चाहिए।
इस फैसले से कई राज्यों में हलचल मच गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्य जहां एससी-एसटी आबादी अधिक है, वहां राजनीतिक दल इस पर अपनी राय रख रहे हैं। विपक्षी दल इसे आरक्षण के खिलाफ साजिश बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे सामाजिक उत्थान का कदम मान रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्रीमी लेयर लागू होने से आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। उदाहरणस्वरूप, यदि एक एससी परिवार की सालाना आय 15 लाख है और उसके बच्चे सरकारी नौकरी में हैं, तो उन्हें आरक्षण न मिले। इससे नए अवसर खुलेंगे।
केंद्र सरकार पर दबाव: रिपोर्ट में क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि कोटा के अंदर कोटा और क्रीमी लेयर पर क्या कदम उठाए गए। सरकार को विधेयक लाने या अधिसूचना जारी करने की जरूरत है। सामाजिक न्याय मंत्रालय ने पिछले साल एक ड्राफ्ट जारी किया था, जिसमें एससी-एसटी क्रीमी लेयर की आय सीमा 15 लाख रखी गई थी। लेकिन इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई न हुई तो contempt प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
यह मामला अनुसूचित जाति जनजाति आरक्षण की 75 साल पुरानी व्यवस्था को नया रूप दे सकता है। संविधान निर्माताओं ने डॉ. बीआर अंबेडकर के नेतृत्व में आरक्षण को सामाजिक समानता का हथियार बनाया था, लेकिन अब समय के साथ बदलाव जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करेगा।
प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं
SC/ST आरक्षण पर यह फैसला न केवल सरकारी नौकरियों बल्कि शैक्षणिक संस्थानों पर भी लागू होगा। आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों में आरक्षण वितरण प्रभावित हो सकता है। राजनीतिक रूप से, 2024 चुनावों के बाद यह मुद्दा गरमाया था, और अब 2026 में भी बहस जारी रहेगी। केंद्र सरकार को जल्द निर्णय लेना होगा, वरना कोर्ट सख्त कदम उठा सकता है।
निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश SC/ST आरक्षण को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाने की दिशा में मील का पत्थर है। केंद्र की रिपोर्ट से साफ होगा कि सामाजिक न्याय की राह में कितना आगे बढ़ा गया है।