पूंजीपतियों की सरकार के खिलाफ आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने उठाई आवाजपूंजीपतियों की सरकार के खिलाफ आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने उठाई आवाज
(1) आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने हाल ही में एक बड़ा राजनीतिक हमला बोला।
(2) उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार पूरी तरह से पूंजीपतियों के इशारों पर चल रही है।
(3) संजय सिंह का आरोप है कि जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करके केवल उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाया जा रहा है।
(4) उन्होंने यह बयान संसद और मीडिया दोनों मंचों से दिया।
(5) संजय सिंह ने कहा कि आज लोकतंत्र खतरे में है।
(6) जनता की आवाज दबाई जा रही है।
(7) किसानों की समस्याएँ अनदेखी की जा रही हैं।
(8) बेरोजगार युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा।
(9) महंगाई लगातार बढ़ रही है।
(10) फिर भी सरकार केवल अमीर पूंजीपतियों का पक्ष ले रही है।
(11) संजय सिंह ने कहा कि संसद में जब भी सवाल उठाए जाते हैं, सरकार उनसे बचती है।
(12) आम आदमी की समस्याओं पर चर्चा नहीं होती।
(13) लेकिन बड़े उद्योगपतियों को करोड़ों-करोड़ों के कर छूट दिए जाते हैं।
(14) सरकारी संपत्तियाँ निजी हाथों में बेची जा रही हैं।
(15) सरकारी कंपनियों का निजीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है।
(16) रेल, एयरपोर्ट, बिजली, तेल सब पर निजी कंपनियों का कब्ज़ा कराया जा रहा है।
(17) उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र का अपमान है।
(18) जनता टैक्स देती है, लेकिन लाभ उद्योगपतियों को मिलता है।
(19) गरीब को केवल वादे मिलते हैं।
(20) लेकिन पूंजीपतियों को ठोस सौगात दी जाती है।
(21) संजय सिंह ने कहा कि आज किसान आत्महत्या कर रहा है।
(22) लेकिन सरकार कह रही है कि सब अच्छा है।
(23) महंगाई से गरीब आदमी का बजट बिगड़ रहा है।
(24) लेकिन सरकार उद्योगपतियों को मुनाफ़ा कमाने दे रही है।
(25) बेरोजगारी ऐतिहासिक स्तर पर है।
(26) लेकिन सरकार केवल चुनावी जुमले देती है।
(27) विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाता।
(28) मीडिया को डराया जाता है।
(29) और जो सरकार के खिलाफ बोलता है, उस पर एजेंसियों का इस्तेमाल होता है।
(30) यह तानाशाही है।
(31) संजय सिंह ने यह भी कहा कि आज देश के संसाधनों पर कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों का कब्ज़ा हो चुका है।
(32) जनता के हितों की अनदेखी की जा रही है।
(33) यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि कॉर्पोरेटक्रेसी है।
(34) संसद जनता के लिए होनी चाहिए।
(35) लेकिन संसद उद्योगपतियों के लिए चल रही है।
(36) जनता के मुद्दे गायब हैं।
(37) गरीब की थाली से अनाज छिन रहा है।
(38) लेकिन पूंजीपतियों के मुनाफ़े की गारंटी दी जा रही है।
(39) यह राजनीति नहीं, व्यापार है।
(40) और व्यापार भी केवल पूंजीपतियों का।