सत्य साई बाबा का यह जन्मशताब्दी वर्ष हमारी पीढ़ी के लिए केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक दिव्य वरदान है। यह वर्ष हमें उस युगपुरुष के जीवन, विचारों और मानवीय मूल्यों को पुनः समझने और आत्मसात करने का अवसर प्रदान करता है, जिनकी शिक्षाएं आज भी अनगिनत लोगों को जीवन का सच्चा अर्थ सिखा रही हैं।
सत्य साई बाबा का जीवन करुणा, प्रेम, त्याग और सेवा का अद्भुत उदाहरण रहा है, जो हर वर्ग और हर समुदाय को एक एकता के सूत्र में बाँधने का संदेश देता है।सत्य साई बाबा का जीवन और दर्शनसत्य साई बाबा का जन्म 23 नवंबर 1926 को आंध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी गाँव में हुआ था। बचपन से ही वे असाधारण आध्यात्मिक प्रतिभा और करुणा के प्रतीक थे।
उन्होंने मानवता की सेवा को ही ईश्वर की सच्ची उपासना बताया। उनका संदेश सरल लेकिन अत्यंत गूढ़ था – “सभी धर्म एक हैं, सभी मानव एक हैं।” बाबा ने सद्गुण, सत्य और प्रेम के माध्यम से समाज को आत्मबल, नैतिकता और आध्यात्मिकता की राह पर अग्रसर करने का कार्य किया।
उनकी शिक्षाएं किसी एक संप्रदाय या धर्म से बंधी नहीं थीं। उन्होंने सभी धर्मों के सार को अपनाया और लोगों से आग्रह किया कि वे ईश्वर के मार्ग पर मानवता के कल्याण के लिए चलें। सत्य साई बाबा के विचारों में सबसे प्रमुख तत्व था प्रेम—निःस्वार्थ, शुद्ध और सार्वभौमिक प्रेम।सेवा ही सच्ची साधनाबाबा ने कहा था कि सेवा सबसे बड़ी साधना है, और उन्होंने इसे स्वयं अपने जीवन से सिद्ध किया।
उनके मार्गदर्शन में अनगिनत समाजसेवी कार्य हुए—अस्पतालों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और स्वच्छ पेयजल योजनाओं की स्थापना इसका प्रमाण हैं। सत्य साई बाबा ट्रस्ट ने निःशुल्क चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दिया है, वह आज भी दुनिया के लिए प्रेरक उदाहरण है।
उनका यह विश्वास था कि हर व्यक्ति में divinity यानी दिव्यता छिपी हुई है। यदि मनुष्य प्रेम और सेवा के मार्ग पर चलता है, तो वह अपने भीतर के ईश्वर को पहचान सकता है। बाबा के अनुयायियों ने इस सिद्धांत को जीवन का आधार बना लिया। आज भी “सेवा संगठन” उनके विचारों के अनुरूप गरीबों, बीमारों और जरूरतमंदों की निस्वार्थ सेवा में जुटे हैं।
आधुनिक युग में साई संदेश की प्रासंगिकताआज की भागदौड़, तनाव और भौतिकता से भरे वातावरण में सत्य साई बाबा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। वे कहते थे कि “मनुष्य को पहले स्वयं को जीतना चाहिए।” यह विचार आज के युग में मानसिक संतुलन, नैतिक जागरूकता और आत्म-साक्षात्कार की कुंजी बन सकता है।
उनकी शिक्षा यह भी थी कि धर्म का सार किसी बाहरी अनुष्ठान या कर्मकांड में नहीं, बल्कि मानवीय आचरण में है। “सत्य बोलो, धर्म का पालन करो, प्रेम से सबका भला करो”—यह उनका जीवनमंत्र था। यदि समाज इस विचार को अपनाए, तो सभी मतभेद मिट सकते हैं और सच्चे वैश्विक भाईचारे का निर्माण हो सकता है।
जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर परसत्य साई बाबा का जन्मशताब्दी वर्ष केवल स्मरण का क्षण नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और नये संकल्प का अवसर है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर हमें समाज में एक ऐसा युग लाना है, जिसमें मानवता सर्वोपरि हो।
उनके अनुयायी इस वर्ष पूरे भारत और विदेशों में सेवा शिविर, रक्तदान, पेड़ारोपण, शिक्षा और स्वास्थ्य कार्यक्रम चला रहे हैं।यह वर्ष हमें यह समझाने का अवसर देता है कि साई बाबा की उपस्थिति केवल उनके शरीर तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके विचार निरंतर बहते रहने वाली आध्यात्मिक धारा हैं।
जब कोई व्यक्ति किसी भूखे को भोजन देता है, किसी बीमार की सेवा करता है, किसी वंचित बालक को शिक्षा देता है—वहीं बाबा साकार हो उठते हैं।साई का अमर सन्देशबाबा ने कहा था — “जीवन का उद्देश्य ईश्वर को खोजना नहीं, बल्कि स्वयं को ईश्वर के रूप में पहचानना है।” उनका यह विचार हर व्यक्ति में आत्मसाक्षात्कार की ज्वाला जलाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब मनुष्य का हृदय करुणा और प्रेम से भर जाता है, तब वही सच्ची भक्ति होती है।उनकी शिक्षाएं हमें यह भी बताती हैं कि आध्यात्मिकता और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं। जब विज्ञान और आध्यात्म – दोनों का समन्वय होता है, तब समाज का वास्तविक उत्थान संभव होता है। यही कारण है कि सत्य साई संस्थान न केवल आध्यात्मिक केंद्रों में बल्कि आधुनिक चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा में भी अग्रणी हैं।।