बिहार के सीतामढ़ी जिले ने मत्स्य पालन के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। यहां रिकॉर्डतोड़ मछली उत्पादन हो रहा है, जो न केवल स्थानीय बाजारों को भरपूर सप्लाई दे रहा है, बल्कि नेपाल के सीमावर्ती इलाकों और उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक मछली पहुंच रही है। पिछले सात वर्षों में वैज्ञानिक तकनीकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सरकारी योजनाओं के सहयोग से जिला मत्स्य पालन में आत्मनिर्भर बन गया है। पहले आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से मछली मंगानी पड़ती थी, लेकिन अब सीतामढ़ी खुद एक बड़ा निर्यातक बन चुका है। यह उपलब्धि बिहार की ‘नीली क्रांति’ का बेहतरीन उदाहरण है।
उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि
सीतामढ़ी जिले में कुल 3172 हेक्टेयर जल क्षेत्र उपलब्ध है, जिसमें तालाब, चौर, नहरें और छोटे जलाशय शामिल हैं। इन संसाधनों का कुशल उपयोग करके जिले ने हर साल उत्पादन में 1000-2000 मीट्रिक टन (टीएमटी) की बढ़ोतरी दर्ज की है। वित्त वर्ष 2024-25 में निर्धारित लक्ष्य 22.60 टीएमटी था, जिसमें अब तक 13 टीएमटी उत्पादन हो चुका है और सीजन अभी बाकी है। यह आंकड़ा बिहार के अन्य जिलों के लिए मॉडल बन रहा है।
जिला मत्स्य अधिकारी सुभाष चंद्र यादव ने बताया कि किसानों को नियमित प्रशिक्षण, बेहतर बीज (फिंगरलिंग), फीड मैनेजमेंट और रोग नियंत्रण की तकनीकी सहायता दी गई। परिणामस्वरूप उत्पादकता में 30-40% की वृद्धि हुई। रोहू, कतला, मृगल, पंगास, सिंहाला और कॉमन कार्प जैसी प्रजातियां प्रमुख हैं। स्थानीय बाजारों के अलावा नेपाल के रक्सौल, विरगंज और बिरौल जैसे इलाकों में सप्लाई बढ़ी है, जबकि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया और कुशीनगर तक ट्रक से मछली जा रही है।
बिहार का मत्स्य उत्पादन: तेजी से ऊपर
बिहार लैंडलॉक्ड राज्य होने के बावजूद मत्स्य उत्पादन में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। 2005 से पहले राज्य का कुल उत्पादन मात्र 2.68 लाख मीट्रिक टन था, जो 2023-24 में 8.73 लाख टन और 2024-25 में 9.59 लाख टन तक पहुंच गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘समेकित चौर विकास योजना’ ने इसमें बड़ा योगदान दिया। इस योजना के तहत 461 हेक्टेयर चौर भूमि पर तालाब बनाए गए, जिससे सीतामढ़ी जैसे जिलों में अतिरिक्त जल क्षेत्र उपलब्ध हुआ।
राज्य सरकार ने मत्स्य बीज उत्पादन केंद्रों की संख्या बढ़ाई, सब्सिडी पर फीड और उपकरण दिए, और ‘मत्स्य क्रांति योजना’ के तहत महिलाओं और युवाओं को प्रशिक्षित किया। परिणामस्वरूप बिहार अब देश के प्रमुख मछली उत्पादक राज्यों (आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात के बाद) में शुमार है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
सीतामढ़ी में मत्स्य पालन से हजारों परिवारों को रोजगार मिला है। छोटे-मझोले किसान, भूमिहीन मजदूर और महिलाएं
इस व्यवसाय से जुड़ी हैं। एक हेक्टेयर तालाब से सालाना 4-6 लाख रुपये तक की आय संभव हो गई है।
मछली निर्यात से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और किसानों की आय में वृद्धि हुई।
नेपाल और UP में मांग बढ़ने से ट्रांसपोर्ट और कोल्ड चेन व्यवसाय भी फला-फूला।
चुनौतियां और भविष्य
हालांकि सफलता मिली है, लेकिन जल स्तर में उतार-चढ़ाव, रोग नियंत्रण और बाजार मूल्य स्थिरता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
अधिकारी कहते हैं कि आने वाले वर्षों में उत्पादन 25-30 टीएमटी तक पहुंच सकता है।
ड्रिप इरिगेशन, बायोफ्लॉक तकनीक और ऑर्गेनिक फीडिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सीतामढ़ी का रिकॉर्डतोड़ मछली उत्पादन बिहार की नीली क्रांति की मिसाल है। वैज्ञानिक तरीकों, सरकारी सहयोग और
किसानों की मेहनत से जिला न केवल आत्मनिर्भर बना, बल्कि पड़ोसी राज्यों और देश के लिए सप्लाई हब बन गया।
यह सफलता अन्य जिलों के लिए प्रेरणा है और बिहार को
मत्स्य क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है