लोकसभा के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चल रही चर्चा का चरम उस समय देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जवाब देने के लिए निर्धारित भाषण भारी हंगामे के बीच परंपरा के मुताबिक राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के बाद प्रधानमंत्री पूरे सदन के सामने सरकार का पक्ष रखते हैं, लेकिन इस बार विपक्षी दलों के ज़ोरदार विरोध, नारेबाज़ी और बैनरबाज़ी ने सदन की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए।
विपक्ष के नारेबाजी और बैनरबाज़ी से बाधित हुई कार्यवाही
सुबह से ही लोकसभा में विपक्षी दलों के सदस्य विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए थे और इसी कारण कार्यवाही को दिन में कई बार स्थगित करना पड़ा। जब शाम पांच बजे प्रधानमंत्री के लोकसभा में आने और अपना संबोधन देने का समय नज़दीक आया, तब भी विपक्ष का शोरगुल थमने का नाम नहीं ले रहा था। स्पीकर की बार–बार की अपील, चेतावनियों और अनुरोधों के बावजूद विपक्षी सदस्य अपनी सीटों पर लौटने को तैयार नहीं हुए, जिससे तनावपूर्ण माहौल और गहरा गया।
पीएम की कुर्सी घेरने पर बढ़ा तनाव, स्पीकर ने जताई चिंता
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कई विपक्षी महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी के आसपास घेराबंदी कर ली और हाथों में बैनर लेकर सरकार विरोधी नारे लगाने लगीं। यह दृश्य संसदीय परंपराओं के उलट माना गया और सत्ता पक्ष ने इसे प्रधानमंत्री के खिलाफ एक तरह की आक्रामक रणनीति बताते हुए सुरक्षा के लिहाज़ से भी चिंताजनक बताया। स्पीकर ने इसे सदन की मर्यादा के खिलाफ करार देते हुए सदस्यों को अपनी–अपनी जगह लौटने की सख्त नसीहत दी, लेकिन हंगामा जारी रहने पर आखिरकार उन्हें कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी।
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल का विपक्ष पर निशाना
इस सारे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम बात यह रही कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के औपचारिक जवाब के बिना ही ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। आम तौर पर धन्यवाद प्रस्ताव पर विस्तृत बहस के बाद प्रधानमंत्री विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों और आलोचनाओं का जवाब देते हैं, फिर मतदान होता है, लेकिन इस बार हंगामे की वजह से स्पीकर ने सीधे संशोधनों को वोटिंग के लिए रखा और उन्हें खारिज करते हुए प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने बहस से भागने और असहज सवालों से बचने के लिए जल्दबाज़ी में यह रास्ता चुना, जबकि सत्ता पक्ष इसे सदन की गरिमा के लिए उठाया गया मजबूरन कदम बता रहा है
कांग्रेस और विपक्ष ने सरकार पर जिम्मेदारी से भागने का लगाया आरोप
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने हंगामे के लिए पूरी तरह विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि विपक्ष के सांसद जानबूझकर ऐसी रणनीति अपना रहे हैं, ताकि प्रधानमंत्री सदन में अपना पक्ष रख ही न सकें। उनका कहना है कि पीएम मोदी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देने के लिए तैयार थे, लेकिन विपक्ष ने नारेबाज़ी और कुर्सी घेरने जैसी हरकतों से उन्हें उनकी सीट तक पहुंचने ही नहीं दिया। मेघवाल के मुताबिक, यह लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है और जनता उन सांसदों से जवाब मांगेगी, जिन्होंने संसद की कार्यवाही बाधित की।
अब कब होगा प्रधानमंत्री का संबोधन? लोकसभा की अगली रणनीति
दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार पर ही संसद में गतिरोध पैदा करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि विपक्ष सिर्फ अपनी मांगों और मुद्दों पर चर्चा चाहता था, लेकिन सरकार सुनने के बजाय स्पीकर के पीछे छिपकर बहुमत के दम पर प्रस्ताव पारित करा ले गई। कुछ विपक्षी सांसदों ने यह भी कहा कि अगर सरकार सचमुच चर्चा के लिए गंभीर होती तो प्रधानमंत्री खुद आगे बढ़कर विपक्ष से संवाद स्थापित करते और सदन को सुचारु रूप से चलाने का प्रयास करते। इस तकरार ने सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया है
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि लोकसभा की अगली बैठक में प्रधानमंत्री कब और किन परिस्थितियों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपना जवाब दे पाएंगे। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में भी संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ सकती है, जिसका सीधा असर बजट, विकास योजनाओं और आम जनजीवन से जुड़े फैसलों पर पड़ेगा। यही कारण है कि इस पूरे विवाद ने न सिर्फ संसद के भीतर बल्कि देशभर में लोकतांत्रिक आचरण और संसदीय मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी है।