सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की हलचल तेज, चिनाब नदी बांध निर्माण समीक्षा शुरू | ICJ जाने की तैयारी

सिंधु जल संधि का पुराना विवाद नया मोड़ ले रहा है

सिंधु जल संधि 1960 विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई एक ऐतिहासिक समझौता है, जो सिंधु नदी प्रणाली के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है। संधि के अनुसार, भारत को पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज) का पूर्ण उपयोग और पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) पर सीमित ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाओं का अधिकार है। लेकिन 2026 में चिनाब नदी पर भारत की रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (850 MW) और अन्य बांधों के तेज निर्माण ने पाकिस्तान में हलचल मचा दी है। पाकिस्तान दावा करता है कि ये परियोजनाएं संधि का उल्लंघन हैं, जिससे उनकी कृषि और जल सुरक्षा प्रभावित हो रही है। पाकिस्तान ने चिनाब नदी बांध समीक्षा शुरू की है और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) जाने की तैयारी तेज कर दी है।

चिनाब नदी बांध निर्माण: भारत की परियोजनाएं और पाकिस्तान का विरोध

चिनाब नदी पर भारत रतले (किश्तवाड़, जम्मू-कश्मीर) सहित किरु, क्वार और अन्य हाइड्रो प्रोजेक्ट्स तेजी से बना रहा है। रतले प्रोजेक्ट 850 MW बिजली उत्पादन करेगा और बाढ़ नियंत्रण में मददगार होगा। भारत का तर्क है कि ये ‘रन ऑफ द रिवर’ प्रकार की हैं, जो संधि के अनुरूप हैं और पाकिस्तान को जल प्रवाह में कोई कमी नहीं आएगी। लेकिन पाकिस्तान इनके डिजाइन (पॉन्डेज, स्पिलवे) पर आपत्ति जता रहा है। पाकिस्तानी मीडिया और सरकार की उच्च स्तरीय बैठकों में चिनाब नदी बांध की निगरानी हो रही है। जल मंत्री ने कहा कि ये परियोजनाएं पाकिस्तान के जल अधिकारों का उल्लंघन हैं। 2025-26 में भारत ने संधि को ‘अबेयेंस’ में रखा है, जिससे निर्माण तेज हुआ है।

पाकिस्तान की ICJ और PCA तैयारी: कूटनीतिक और कानूनी कदम

पाकिस्तान अब विवाद को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ले जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विदेश मंत्रालय ने विश्व बैंक से मध्यस्थता की मांग की है, जो संधि का नियुक्त प्राधिकारी है। यदि बैंक सहमत न हुआ तो सीधे ICJ का रुख किया जाएगा। पाकिस्तान का तर्क है कि चिनाब नदी बांध से जल प्रवाह प्रभावित हो रहा है, जो पंजाब प्रांत की कृषि (अर्थव्यवस्था का 20%) को नुकसान पहुंचा रहा है। स्थायी मध्यस्थता आयोग (PCA) में किशनगंगा और रतले पर सुनवाई चल रही है। फरवरी 2026 में PCA ने 2-3 फरवरी को सुनवाई की, जहां भारत को डेटा शेयर करने का आदेश दिया गया, लेकिन भारत ने कोर्ट की क्षेत्राधिकार को खारिज कर दिया। पाकिस्तान PCA की सकारात्मक राय से उत्साहित है और ICJ में नया केस दाखिल करने की तैयारी कर रहा है।

भारत का मजबूत रुख: विकास और सुरक्षा पर फोकस

भारत ने स्पष्ट किया है कि सभी परियोजनाएं संधि के प्रावधानों के अनुरूप हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल संसाधनों के इष्टतम उपयोग पर जोर दिया है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने संसद में कहा कि पाकिस्तान के आरोप बेबुनियाद हैं। भारत ने संधि को ‘अबेयेंस’ में रखा है और डबल एज कैनाल जैसे प्रोजेक्ट्स को गति दी है। ये परियोजनाएं ऊर्जा सुरक्षा, बाढ़ प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण हैं। भारत PCA और ICJ के आदेशों को अस्वीकार कर रहा है, क्योंकि संधि में एकतरफा संशोधन या अबेयेंस का प्रावधान है।

क्षेत्रीय प्रभाव: पूर्वी UP और जम्मू-कश्मीर पर असर

वाराणसी, गोरखपुर जैसे पूर्वांचल क्षेत्रों में यह विवाद चर्चा में है। स्थानीय किसान और विशेषज्ञ मानते हैं कि

भारत को अपने जल संसाधनों का पूरा उपयोग करना चाहिए।

पाकिस्तान ICJ जाने से संबंध और तनावपूर्ण हो सकते हैं।

पर्यावरणविदों का कहना है कि चिनाब नदी बांध बाढ़ प्रबंधन में सहायक होंगे, लेकिन पारिस्थितिक संतुलन जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन से नदी प्रवाह प्रभावित हो रहा है, इसलिए संधि अपडेट की जरूरत है।

बातचीत ही समाधान का रास्ता

विशेषज्ञों के अनुसार, ICJ में केस 2-3 साल चल सकता है। पाकिस्तान की हलचल तेज है,

लेकिन भारत का रुख मजबूत है। दोनों देशों को कूटनीतिक बातचीत से

विवाद सुलझाना चाहिए। सिंधु जल संधि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है,

लेकिन जलवायु बदलाव और सुरक्षा जरूरतों से इसे अपडेट करना होगा।