वित्तविहीन शिक्षकों को मानदेय और तबादले जारी करने की मांग तेज, आंदोलन की तैयारी
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सबसे बड़े सवालों में से एक है – वित्तविहीन विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की स्थिति। लंबे समय से इन शिक्षकों की आर्थिक और सामाजिक दिक्कतों को लेकर आवाज़ उठाई जा रही है, लेकिन समाधान अब तक सामने नहीं आया। इन्हीं मुद्दों को लेकर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ (चेतले गुट) ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने स्पष्ट कर दिया है कि अब शिक्षकों के सम्मान और अधिकारों से समझौता नहीं होगा। यदि सरकार ने तुरंत कार्रवाई नहीं की तो प्रदेश भर में चरणबद्ध आंदोलन छेड़ा जाएगा।
संगठन की राज्य कार्यकारिणी की बैठक
रविवार को राजधानी लखनऊ में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ (चेतले गुट) की राज्य कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। बैठक में वित्तविहीन शिक्षकों को मानदेय दिलाने, शिक्षकों के लंबित तबादला आदेश जारी कराने और नियुक्ति-स्थानांतरण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने पर गहन चर्चा हुई।
बैठक की अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष रामशरण दास नारायण सिंह ने की। उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने अब तक केवल आश्वासन ही दिया है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं किया गया। वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षक बेहद दयनीय हालात में जी रहे हैं। वे वर्षों से बिना मानदेय के पढ़ा रहे हैं, जबकि उन्हीं की मेहनत से विद्यालय और छात्र शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़े हुए हैं।
मानदेय की मांग – शिक्षकों का जीने का सवाल
बैठक में मौजूद शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि “मानदेय हमारी जिंदगी और भविष्य का सवाल है।” सरकार हर स्तर पर शिक्षा सुधार की बात करती है, लेकिन वित्तविहीन शिक्षकों की अनदेखी कर देती है। हजारों शिक्षक ऐसे हैं जो बेहद कम साधनों में अपना गुज़ारा कर रहे हैं।
प्रदेश महामंत्री अनिल त्रिपाठी ने कहा –
“जब तक वित्तविहीन शिक्षकों को उचित मानदेय नहीं मिलेगा, तब तक शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती रहेगी। शिक्षकों को सम्मान और अधिकार मिले बिना किसी भी शिक्षा नीति को सफल नहीं बनाया जा सकता।”
तबादले का मुद्दा – आदेश जारी, अमल नहीं
संगठन ने इस बात पर भी रोष जताया कि प्रदेश सरकार ने कई शिक्षकों के तबादला आदेश जारी कर दिए हैं, लेकिन अब तक उन्हें लागू नहीं किया गया है। इससे शिक्षक परेशान हैं। किसी शिक्षक का परिवार दूसरे जिले में है तो कोई स्वास्थ्य कारणों से तबादले का इंतजार कर रहा है। आदेश होने के बावजूद अमल न होना, शिक्षकों के साथ अन्याय है।
प्रदेश मंत्री संजय द्विवेदी ने कहा कि सरकार केवल कागजों में आदेश जारी कर दिखावा कर रही है, लेकिन जब तक इन आदेशों पर अमल नहीं होगा, तब तक शिक्षकों का भरोसा सरकार पर नहीं बनेगा।
आंदोलन की रूपरेखा
बैठक में निर्णय लिया गया कि आंदोलन चरणबद्ध और लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जाएगा। सबसे पहले संगठन सरकार को मांगपत्र सौंपेगा। यदि उस पर भी सुनवाई नहीं हुई तो ब्लॉक और जिला स्तर पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।
सभी जिला अध्यक्षों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने जिले में बैठकें कर शिक्षकों को एकजुट करें।
ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं और शिक्षकों की समितियाँ बनाई जाएंगी।
संगठन मतदाता जागरूकता अभियान भी चलाएगा और वित्तविहीन शिक्षकों को मतदाता बनाने का कार्य युद्धस्तर पर करेगा।
विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सरकार पर दबाव बनाने के लिए यह संगठन राजनीतिक विकल्प तलाशने से भी पीछे नहीं हटेगा।
शिक्षकों का गुस्सा और संकल्प
शिक्षकों का कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अब पीछे नहीं हटेंगे। एक शिक्षक ने बैठक में कहा –
“हमने वर्षों तक सेवा की है, बच्चों को पढ़ाया है, भविष्य संवारने का काम किया है। अगर हमें ही मानदेय और तबादले जैसे बुनियादी अधिकार नहीं मिलेंगे, तो यह हमारे आत्मसम्मान पर चोट है।”
प्रदेश अध्यक्ष रामशरण दास नारायण सिंह ने दोहराया कि सरकार यदि शिक्षकों की मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करेगी, तो आंदोलन की लपटें प्रदेश के हर जिले में दिखाई देंगी।
सरकार पर संवेदनहीन होने का आरोप
बैठक में कई वक्ताओं ने कहा कि सरकार शिक्षकों के साथ संवेदनशील व्यवहार नहीं कर रही है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों और नेताओं से कई बार वार्ता हुई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला।
अनिल त्रिपाठी ने कहा –
“अब आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। यदि सरकार ने हमारी मांगें पूरी नहीं कीं, तो संगठन पूरी मजबूती से सड़क पर उतरेगा।”
निष्कर्ष
स्पष्ट है कि वित्तविहीन शिक्षकों का धैर्य अब टूट चुका है। वे अपने अधिकारों और सम्मान के लिए आंदोलन की राह पर चलने को मजबूर हो चुके हैं। संगठन ने सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि मानदेय, तबादला आदेश और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग को किसी भी कीमत पर दबने नहीं दिया जाएगा।
आने वाले दिनों में यह आंदोलन कितना व्यापक रूप लेता है, यह सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। यदि शिक्षकों की मांगों को जल्द मान लिया गया तो हालात शांत हो सकते हैं, लेकिन अगर उपेक्षा जारी रही तो उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था एक बड़े आंदोलन की चपेट में आ सकती है।
