एक समय का सशक्त अखबार अब कर्मचारियों की बदहाली का प्रतीक
गोरखपुर। राष्ट्रीय सहारा अखबार, जो कभी सत्ता और सिस्टम से बेबाक सवाल पूछता था, आज बंद हो चुका है। 8 जनवरी 2026 से इसकी छपाई ठप है, दफ्तरों पर ताले लटक रहे हैं और गोरखपुर के दर्जनों सहाराकर्मी सड़क पर उतर आए हैं। महीनों से वेतन बकाया होने के कारण परिवार भुखमरी के कगार पर हैं। आज सुबह 11 बजे ये कर्मचारी जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन करने जा रहे हैं और डीएम से इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक संकट है, बल्कि पत्रकारिता के सम्मान और लोकतंत्र की नींव पर गहरा सवाल खड़ा कर रही है।
सहाराकर्मियों की व्यथा: महीनों का वेतन बकाया, परिवार संकट में
गोरखपुर के सहाराकर्मियों ने बताया कि पिछले कई महीनों से उन्हें एक पैसा भी वेतन नहीं मिला। बच्चों की स्कूल फीस बकाया है, घर का किराया नहीं चुक पा रहे, दवाइयों का इंतजाम तक मुश्किल हो गया है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमने बरसों तक प्रबंधन की निष्ठा से काम किया, अखबार को मजबूत बनाने में अपनी जान लगा दी, लेकिन आज हम बेरोजगार हो गए। प्रबंधन की संवेदनहीनता ने हमें सड़क पर ला दिया।” यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि पत्रकारिता के सम्मान पर चोट है। दर्जनों परिवार प्रभावित हैं और गोरखपुर जैसे शहर में जहां मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा माना जाता है, वहां पत्रकारों का यह हाल चिंताजनक है। प्रबंधन ने कोई नोटिस नहीं दिया, बस एकतरफा फैसला ले लिया।
राष्ट्रीय सहारा का इतिहास: सत्ता से सवाल करने वाला अखबार अब कर्मचारियों के सवालों का शिकार
राष्ट्रीय सहारा की स्थापना 1985 में हुई थी। यह उर्दू और हिंदी में प्रकाशित प्रमुख दैनिक था, जिसकी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों में मजबूत पकड़ थी। गोरखपुर संस्करण ने स्थानीय राजनीति, अपराध, विकास और सामाजिक मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की। लेकिन वित्तीय संकट, डिजिटल मीडिया की चुनौतियां और प्रबंधकीय लापरवाही ने इसे बंद करने पर मजबूर कर दिया। कर्मचारियों के अनुसार, लॉकडाउन के बाद से वेतन में देरी शुरू हो गई थी। 2025 के अंत तक हालात बदतर हुए और 8 जनवरी 2026 को अंतिम संस्करण छपा। सवाल उठता है—क्या अखबार बंद करने का फैसला सिर्फ व्यवसायिक था या कर्मचारियों की जिंदगी को दांव पर लगाने का?
प्रशासन के दरवाजे पर धरना: डीएम से वेतन भुगतान और पुनर्वास की मांग
आज सुबह 11 बजे गोरखपुर डीएम कार्यालय के बाहर सहाराकर्मी इकट्ठा होंगे। उनकी मुख्य मांगें हैं:
- महीनों का बकाया वेतन तत्काल भुगतान
- प्रबंधन पर कानूनी कार्रवाई
- बेरोजगार कर्मचारियों के लिए पुनर्वास योजना या सरकारी सहायता
- श्रम विभाग की जांच डीएम से अपील है कि फाइलों से इतर इन इंसानों की तरफ देखें। लखनऊ और दिल्ली में भी सहारा कर्मचारियों ने प्रदर्शन किए, लेकिन गोरखपुर का आंदोलन ज्यादा आक्रामक है। गोरखपुर प्रेस क्लब ने समर्थन की घोषणा की है।
सवाल सत्ता और सिस्टम पर: पत्रकार सड़क पर तो लोकतंत्र कहां?
राष्ट्रीय सहारा बंद से बड़ा सवाल यह है कि अगर पत्रकार ही भुखमरी के कगार पर हैं,
तो लोकतंत्र का चौथा खंभा कैसे खड़ा रहेगा? सरकारें मीडिया को नियंत्रित करने की बात करती हैं, लेकिन अपने राज्य के पत्रकारों की अनदेखी कर रही हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए। क्या योगी आदित्यनाथ सरकार पत्रकारों के हक के लिए आवाज उठाएगी? यह घटना मीडिया कर्मचारियों के शोषण की कड़वी सच्चाई उजागर करती है।
डिजिटल युग में पारंपरिक अखबारों का संकट बढ़ रहा है, लेकिन कर्मचारियों का भविष्य कौन संभालेगा? सहाराकर्मी आंदोलन जारी रखेंगे। पाठकों से अपील है—इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर वायरल करें।