मध्य-पूर्व में इजरायल और ईरान के बीच 2026 का युद्ध वैश्विक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन गया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को निशाना बनाया, जिसके बाद ईरान ने मिसाइलों और ड्रोनों से जवाबी कार्रवाई की।
युद्ध की शुरुआत और पृष्ठभूमि
यह संघर्ष ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सालों से बढ़ते तनाव का परिणाम है। 2025 के जून में हुए 12-दिवसीय युद्ध और JCPOA समझौते की विफलता ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी, जो जनवरी 2026 के बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद हुई।
क्षेत्रीय प्रभाव
ईरान ने इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों जैसे बहरीन, जॉर्डन, कुवैत पर हमले किए, जिससे लेबनान में लाखों विस्थापित हुए। 2000 से ज्यादा मौतें हुईं और 16 मध्य-पूर्वी देश प्रभावित हैं, जहां बुनियादी ढांचा नष्ट हो रहा है। हिजबुल्लाह और हूती जैसे समूहों की सक्रियता से संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में बदल गया।
वैश्विक आर्थिक असर
ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो गया। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने 40 करोड़ बैरल रिजर्व छोड़ा, लेकिन महंगाई बढ़ रही है और व्यापार बाधित है। यात्रा और सप्लाई चेन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा, खासकर एशिया और यूरोप में
भारत और एशिया पर प्रभाव
भारत जैसे तेल आयातक देशों में ईंधन महंगा हो रहा है, जो मुद्रास्फीति और व्यापार को प्रभावित करेगा। मध्य-पूर्व में भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा चिंता बढ़ी है और रेमिटेंस प्रभावित हो सकती है। राजनीतिक रूप से, भारत तटस्थ रुख अपनाएगा लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोत तलाशेगा।
मानवीय संकट
लेबनान और ईरान में सैकड़ों हजारों बेघर हुए, जबकि यात्रियों के फंसने से वैश्विक उड़ानें रुकीं। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी कि हिंसा 16 देशों तक फैल रही है, जहां भोजन और चिकित्सा आपूर्ति बाधित है। शरणार्थी संकट मध्य-पूर्व से यूरोप और एशिया तक फैल सकता है।
अमेरिका ने मध्य-पूर्व में F-35 विमान तैनात किए, जबकि चीन-रूस ने निंदा की। संयुक्त राष्ट्र में शांति प्रयास विफल हो रहे हैं और क्षेत्रीय देश जैसे सऊदी अरब सतर्क हैं। यह युद्ध वैश्विक शक्ति संतुलन बदल सकता है।
