पश्चिम एशिया युद्ध से भारत का निर्यात प्रभावित
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध (अमेरिका-इस्राइल-ईरान तनाव) का सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ रहा है। समुद्री मार्गों पर बढ़ती अस्थिरता, जहाजों की रूटिंग में बदलाव और बीमा लागत में उछाल से निर्यातक परेशान हैं। विशेष रूप से मुरादाबाद का प्रसिद्ध पीतल हस्तशिल्प और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बासमती चावल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जानकारों के अनुसार, करीब 40 से 45 हजार कंटेनर बीच राह में अटके हुए हैं, जिससे परिवहन लागत 5 गुना तक बढ़ गई है।
मुरादाबाद पीतल हस्तशिल्प पर गहरा असर
मुरादाबाद और संभल क्षेत्र पीतल हस्तशिल्प के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। यहां से बने लैंप, फर्नीचर, सजावटी सामान, बर्तन और गिफ्ट आइटम्स मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका में भारी मांग रखते हैं। युद्ध के कारण लाल सागर और सूएज नहर मार्ग प्रभावित होने से जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना पड़ रहा है। इससे यात्रा समय 10-15 दिन से बढ़कर 30-40 दिन हो गया है। मुरादाबाद के निर्यातकों का कहना है कि पहले जहां एक कंटेनर की लागत 1.5-2 लाख रुपये थी, अब वह 8-10 लाख तक पहुंच गई है। कई ऑर्डर रद्द हो रहे हैं और नए ऑर्डर पर ग्राहक हिचकिचा रहे हैं।
पश्चिमी यूपी का चावल निर्यात भी संकट में
पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मुरादाबाद, बरेली, सहारनपुर, रामपुर आदि जिलों) से बासमती और गैर-बासमती चावल का बड़ा निर्यात होता है। मध्य पूर्व देश (सऊदी अरब, यूएई, ईरान, इराक) भारतीय चावल के प्रमुख खरीदार हैं। युद्ध से इन देशों में माल पहुंचने में देरी और लागत बढ़ने से निर्यात प्रभावित है। कई कंटेनर बंदरगाहों पर अटके हैं, जिससे चावल की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा है। निर्यातकों का अनुमान है कि अब तक देश का कुल निर्यात प्रभावित होकर लगभग 2000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।
40-45 हजार कंटेनर अटके: लागत में 5 गुना उछाल
वैश्विक शिपिंग लाइनों ने युद्ध जोखिम के कारण कई रूट्स पर जहाज रोक दिए हैं। बीमा प्रीमियम 10-20 गुना बढ़ गया है। भारत से मध्य पूर्व और यूरोप जाने वाले कंटेनरों की संख्या में भारी गिरावट आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि 40-45 हजार कंटेनर विभिन्न बंदरगाहों और समुद्र में फंसे हैं। इससे छोटे-मध्यम निर्यातकों पर सबसे ज्यादा दबाव है, क्योंकि उनके पास बड़े स्टॉक और अतिरिक्त लागत उठाने की क्षमता कम है।
आर्थिक मार का खतरा और निर्यातकों की मांग
यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकता है। पीतल हस्तशिल्प और चावल जैसे क्षेत्रों में
लाखों लोग रोजगार से जुड़े हैं। निर्यात में गिरावट से
बेरोजगारी बढ़ सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है।
निर्यातक संघों ने सरकार से मांग की है कि वैकल्पिक रूट्स के लिए
सब्सिडी, बीमा राहत और जल्द समाधान निकाला जाए।
कुछ निर्यातक एयर कार्गो का सहारा ले रहे हैं, लेकिन यह बहुत महंगा है।
आगे क्या?
युद्ध की स्थिति यदि लंबी चली तो निर्यात में और गिरावट आ सकती है। सरकार और
शिपिंग कंपनियों को मिलकर वैकल्पिक समुद्री रूट्स और राहत पैकेज पर विचार करना होगा। फिलहाल मुरादाबाद और
पश्चिमी यूपी के निर्यातक इस तपिश से झुलस रहे हैं,
जिसका असर पूरे देश के निर्यात कारोबार पर पड़ रहा है।
यह युद्ध न केवल मानवीय संकट है बल्कि वैश्विक व्यापार और
भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है
