प्राचीन भारत में मौर्य साम्राज्य (लगभग 321-185 ईसा पूर्व) पहला ऐसा साम्राज्य था जिसने अखंड भारत का सपना साकार किया। चाणक्य (कौटिल्य) और चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश को उखाड़ फेंका और सिकंदर के सेनापतियों को हराकर विशाल साम्राज्य स्थापित किया। अशोक के शासन में यह अफगानिस्तान से बांग्लादेश तक फैला, लेकिन अशोक की मृत्यु के बाद यह ताश के पत्तों की तरह ढह गया। आखिर क्यों टूटा यह महान साम्राज्य? आइए विस्तार से जानें।
मौर्य साम्राज्य का सुनहरा उदय: चाणक्य-चंद्रगुप्त की कूटनीति
321 ईसा पूर्व में चाणक्य ने अत्याचारी नंद शासक धनानंद को हराने की योजना बनाई। चंद्रगुप्त मौर्य ने मगध पर कब्जा किया और पश्चिम में सेल्यूकस को हराकर संधि की। चाणक्य का अर्थशास्त्र ग्रंथ शासन की कुंजी बना – जासूसी तंत्र, कर व्यवस्था, सेना संगठन और केंद्रीकृत प्रशासन पर आधारित। साम्राज्य हिमालय से विंध्य तक फैला, जो अखंड भारत का प्रतीक था।
अशोक का युग: कलिंग युद्ध से धम्म नीति तक चरमोत्कर्ष
चंद्रगुप्त के बाद बिंदुसार और फिर अशोक (268-232 ईसा पूर्व) आए। कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) में भारी नरसंहार से अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा, धम्म का प्रचार किया। शिलालेखों और स्तंभ लेखों से नीति फैलाई गई। व्यापार, कृषि, सिंचाई और सड़कें मजबूत हुईं। साम्राज्य अफगानिस्तान से असम तक विस्तृत था – लगभग 50 लाख वर्ग किमी क्षेत्र। लेकिन अशोक की मृत्यु के बाद कमजोरियां उभरीं।
मौर्य पतन के प्रमुख कारण: आंतरिक कमजोरियां और बाहरी दबाव
अशोक की मृत्यु (232 ईसा पूर्व) के बाद दशरथ, संप्रति जैसे उत्तराधिकारी दुर्बल साबित हुए। मुख्य कारण:
- कमजोर और अक्षम उत्तराधिकारी, सत्ता संघर्ष
- विशाल सेना और बौद्ध भिक्षुओं को दान से खजाना खाली
- प्रांतों में विद्रोह (तक्षशिला, उज्जैन स्वतंत्र हुए)
- आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढीलापन
- धार्मिक विभाजन (बौद्ध बनाम ब्राह्मण)
- केंद्रीकृत शासन का ढहना, बाहरी आक्रमण (यवन, ग्रीक)
प्रांतों में स्वायत्तता बढ़ी, सेना कमजोर हुई और विदेशी खतरे बढ़े। चाणक्य का मजबूत ढांचा टूट गया।
अंतिम नाखून: बृहद्रथ की हत्या और शुंग वंश का उदय
185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ थे। सेनापति पुष्यमित्र शुंग (ब्राह्मण) ने सैन्य परेड के दौरान उनकी हत्या कर सिंहासन हथिया लिया। शुंग वंश (185-73 ईसा पूर्व) शुरू हुआ। पुष्यमित्र ने बौद्ध प्रभाव कम किया, वैदिक यज्ञों (दो अश्वमेध यज्ञ) को प्रोत्साहन दिया और ब्राह्मणवाद पुनर्स्थापित किया। कुछ स्रोतों में बौद्धों पर अत्याचार का उल्लेख है, लेकिन मुख्य रूप से वैदिक पुनरुत्थान हुआ। साम्राज्य छोटा हो गया, लेकिन शुंगों ने यवनों के आक्रमण रोके। अग्निमित्र, वसुमित्र जैसे शासकों ने शासन चलाया। कला में भरहुत स्तूप जैसी रचनाएं बनीं। बाद में कण्व वंश ने शुंगों को समाप्त किया।
अखंड भारत के पतन से आज के लिए सबक
मौर्य पतन दिखाता है कि महान साम्राज्य भी व्यक्तियों, मजबूत उत्तराधिकार और एकजुट नीतियों पर टिकते हैं। कमजोर नेतृत्व, आर्थिक बोझ, धार्मिक विभाजन और प्रशासनिक भ्रष्टाचार से टूट जाते हैं। चाणक्य-चंद्रगुप्त-अशोक के सपने हमें सिखाते हैं कि अखंड भारत तभी संभव जब केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण में संतुलन, सद्भाव और मजबूत शासन हो।
आज की बहस में यह प्रासंगिक है – एकजुट भारत के लिए मजबूत नीतियां और नेतृत्व जरूरी।