इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता
23-24 जनवरी 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि पत्नी या उसके परिवार के कार्यों के कारण पति कमाने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है, तो वह गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) का दावा नहीं कर सकती। यह फैसला जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला की एकलपीठ द्वारा दिया गया, जिसमें कुशीनगर की विनिता की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने कुशीनगर परिवार अदालत के पहले के फैसले को सही ठहराया, जो पत्नी के गुजारा भत्ता आवेदन को रद्द कर चुका था। यह फैसला वैवाहिक कानूनों और धारा 125 सीआरपीसी के तहत महिलाओं के अधिकारों पर नया दृष्टिकोण पेश करता है।
मामले की पूरी पृष्ठभूमि: कुशीनगर का दर्दनाक घटनाक्रम
यह मामला उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले से जुड़ा है, जहां होम्योपैथिक डॉक्टर वेद प्रकाश सिंह और उनकी पत्नी विनिता के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा था। डॉ. वेद प्रकाश अपनी क्लिनिक चलाकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे और आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम थे। लेकिन एक दिन पत्नी के भाई (साले) और पिता (ससुर) ने क्लिनिक पर हमला कर दिया। हमले में गोली चलाई गई, जो डॉक्टर की रीढ़ की हड्डी में फंस गई। इस घटना के बाद डॉक्टर स्थायी रूप से शारीरिक रूप से अक्षम हो गए। वे न तो चल-फिर सकते हैं और न ही क्लिनिक संभाल सकते हैं, जिससे उनकी कमाई की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो गई।
इसके बावजूद पत्नी विनिता ने पति से गुजारा भत्ता मांगा। निचली अदालत ने सबूतों के आधार पर आवेदन खारिज कर दिया। पत्नी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की, लेकिन हाईकोर्ट ने भी याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां: न्याय और नैतिकता का संतुलन
जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला ने फैसले में कहा, “भारतीय समाज में पति से परिवार का भरण-पोषण करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन यह मामला अनूठा है।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की शारीरिक अक्षमता पर कोई विवाद नहीं है और इसकी जिम्मेदारी पत्नी के परिवार पर है। जस्टिस ने जोर देकर कहा कि पत्नी के कृत्यों या उसके परिवार के आपराधिक कार्यों से पति की आजीविका नष्ट हो गई, ऐसे में पत्नी को गुजारा भत्ता देना भारी अन्याय होगा।
कोर्ट ने आगे टिप्पणी की, “पत्नी का भरण-पोषण पति का पवित्र दायित्व है,
लेकिन अदालतें पत्नी पर ऐसा कोई कानूनी भार नहीं डाल सकतीं। फिर भी,
यदि पत्नी या उसके परिवार के आचरण से पति कमाने लायक नहीं रह जाता,
तो वह इसका लाभ नहीं उठा सकती।”
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से आंखें बंद नहीं करने की बात कही और याचिका खारिज कर दी।
फैसले का महत्व: वैवाहिक कानूनों पर नया नजरिया
यह फैसला गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। आमतौर पर धारा
125 सीआरपीसी के तहत पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार मिलता है,
लेकिन इस मामले में कोर्ट ने पत्नी के परिवार की करतूत को मुख्य आधार बनाया।
यह फैसला समाज में महिलाओं के अधिकारों और
पुरुषों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
न्याय का सही फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला दिखाता है कि अदालतें तथ्यों और न्याय के आधार पर फैसला करती हैं,
चाहे वह किसी भी पक्ष के पक्ष में हो।
डॉ. वेद प्रकाश सिंह जैसे पीड़ितों को न्याय मिला है, जबकि कानूनी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रही