नई दिल्ली। देश में थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में अगस्त महीने के दौरान बढ़ोतरी देखने को मिली है। थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI के आधार पर अगस्त में थोक महंगाई दर 9.92 प्रतिशत दर्ज की गई। महंगाई के इस स्तर ने बाजार और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई है।
कीमतों में तेजी के पीछे ईंधन एवं बिजली, खाद्य वस्तुओं और कुछ विनिर्मित उत्पादों की बढ़ती लागत को प्रमुख वजह माना जा रहा है। महंगाई का दबाव अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है, जिसका असर उत्पादन, परिवहन और आपूर्ति लागत पर पड़ सकता है।
अगस्त में WPI महंगाई 9.92 प्रतिशत
अगस्त में थोक महंगाई दर 9.92 प्रतिशत रही। इसका अर्थ है कि थोक बाजार में वस्तुओं के समग्र मूल्य स्तर में पिछले साल के इसी महीने की तुलना में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई।
WPI में मुख्य रूप से प्राथमिक वस्तुओं, ईंधन एवं बिजली और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों को शामिल किया जाता है। थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहने से कारोबारियों और उद्योगों की लागत प्रभावित हो सकती है।
अगर उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी होती है तो आने वाले समय में इसका कुछ असर बाजार में उपलब्ध तैयार सामान की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
ईंधन और बिजली की कीमतों ने बढ़ाया दबाव
अगस्त की थोक महंगाई में ईंधन और बिजली क्षेत्र का प्रभाव महत्वपूर्ण रहा। पेट्रोलियम से जुड़े उत्पादों और ऊर्जा की कीमतों में बदलाव का असर केवल थोक बाजार तक सीमित नहीं रहता।
परिवहन से लेकर कारखानों में उत्पादन तक ऊर्जा लागत की बड़ी भूमिका होती है। ईंधन की लागत बढ़ने पर माल ढुलाई महंगी हो सकती है। इससे कृषि उत्पादों, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा के सामान को बाजार तक पहुंचाने की लागत भी बढ़ सकती है।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी
अगस्त में खाद्य वस्तुओं की कीमतों का दबाव भी थोक महंगाई के लिए चिंता का विषय रहा।
खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर थोक मूल्य सूचकांक पर पड़ता है।
सब्जियों, अनाज, दालों और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतें मौसम, उत्पादन,
आपूर्ति और मांग जैसे कई कारकों से प्रभावित होती हैं।
ऐसे में आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों की दिशा महंगाई के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।
खाद्य कीमतों में लगातार तेजी बनी रहने पर इसका असर धीरे-धीरे घरेलू बजट पर भी महसूस किया जा सकता है।
विनिर्मित उत्पादों की लागत भी चुनौती
थोक महंगाई में विनिर्मित उत्पादों की कीमतें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कच्चे माल, ऊर्जा, परिवहन और उत्पादन से जुड़ी लागत में बदलाव का असर तैयार माल की कीमतों पर पड़ता है।
अगर कंपनियों की उत्पादन लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो
उनके मुनाफे के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, कंपनियां बढ़ी हुई लागत का
कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाती हैं तो खुदरा बाजार में भी कीमतें बढ़ने की संभावना रहती है।
आम लोगों पर कितना पड़ेगा असर?
WPI और खुदरा महंगाई अलग-अलग संकेतक हैं। इसलिए थोक महंगाई के 9.92 प्रतिशत तक पहुंचने का
सीधा अर्थ यह नहीं है कि उपभोक्ताओं के लिए सभी वस्तुएं इसी अनुपात में महंगी हो जाएंगी।
हालांकि, थोक स्तर पर लागत बढ़ने से आगे चलकर खुदरा कीमतों पर दबाव बनने की
संभावना रहती है। खासकर ईंधन, परिवहन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगातार तेजी रहने पर
इसका असर आम लोगों के खर्च पर पड़ सकता है।
आने वाले महीनों में खाद्य और ईंधन कीमतों पर नजर
अब महंगाई की आगे की दिशा काफी हद तक खाद्य और ईंधन कीमतों पर निर्भर करेगी।
यदि इन क्षेत्रों में कीमतों का दबाव कम होता है तो
आने वाले महीनों में थोक महंगाई में राहत मिल सकती है।
इसके विपरीत ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी जारी रहने पर
थोक स्तर पर महंगाई का दबाव बना रह सकता है। उद्योग, कारोबारी और
उपभोक्ता सभी आने वाले महीनों में कीमतों की दिशा पर नजर रखेंगे।
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