कर्नाटक राज्यपाल विवाद
बेंगलुरु: कर्नाटक में राज्यपाल थावरचंद गहलोत और कांग्रेस सरकार के बीच विवाद अब चरम पर पहुंच गया है। गुरुवार (22 जनवरी 2026) को राज्यपाल ने विधानसभा के संयुक्त सत्र को संबोधित करने विधान सौधा पहुंचे, लेकिन भाषण की महज दो लाइनें पढ़कर मंच छोड़कर चले गए। इस घटना से विधानसभा में भारी हंगामा मच गया। कांग्रेस विधायकों ने ‘शर्म करो’, ‘राज्यपाल मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए और मंच पर कागज फेंककर विरोध जताया। यह घटना पिछले दो दिनों में राज्यपाल और सरकार के बीच हुए लगातार विवादों की नई कड़ी है।
क्या हुआ विधानसभा में?
गुरुवार को बजट सत्र के पहले दिन राज्यपाल थावरचंद गहलोत को विधानसभा और विधान परिषद के संयुक्त सत्र को संबोधित करना था। यह परंपरा के अनुसार राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को रेखांकित करने का अवसर होता है। राज्यपाल मंच पर पहुंचे, लेकिन जैसे ही उन्होंने भाषण की शुरुआत की – “माननीय सदस्यगण, मैं राज्य सरकार के नीति-निर्देशों को…” – तभी उन्होंने पेपर बंद किया और बिना कुछ और पढ़े मंच छोड़ दिया।
इसके तुरंत बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और अन्य कांग्रेस विधायक खड़े होकर नारे लगाने लगे। विधानसभा अध्यक्ष यूटी खादर ने सदन को शांत करने की कोशिश की, लेकिन लगभग 20 मिनट तक हंगामा जारी रहा। कांग्रेस ने इसे “लोकतंत्र का अपमान” और “संवैधानिक पद की गरिमा का हनन” बताया।
पिछले दो दिनों में क्या-क्या विवाद हुए?
यह घटना अकेली नहीं है। पिछले 48 घंटों में राज्यपाल और सरकार के बीच कई टकराव सामने आए हैं:
- मंगलवार (20 जनवरी): राज्यपाल ने विधानसभा में सरकार की ओर से लाए गए दो विधेयकों (पुलिस सुधार और शिक्षा से जुड़े) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ये विधेयक “संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन” करते हैं।
- बुधवार (21 जनवरी): राज्यपाल ने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को पत्र लिखकर विधानसभा सत्र से पहले कैबिनेट की बैठक बुलाने और विधेयकों पर चर्चा करने को कहा। सरकार ने इसे “अनावश्यक हस्तक्षेप” बताया।
- गुरुवार का हंगामा: भाषण में सिर्फ दो लाइन पढ़कर जाने की घटना ने विवाद को नया आयाम दिया।
सरकार और विपक्ष का रुख
मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कहा, “राज्यपाल संविधान की रक्षा करने के बजाय राजनीतिक एजेंडा चला रहे हैं। यह लोकतंत्र पर हमला है।” डीके शिवकुमार ने कहा कि राज्यपाल “केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं”।
वहीं, भाजपा ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि “कांग्रेस ने राज्यपाल का अपमान किया है” और
विधायकों का व्यवहार “शर्मनाक” है।
भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने कहा कि राज्यपाल का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है।
संवैधानिक संकट की आशंका
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल और सरकार के बीच यह टकराव संवैधानिक संकट पैदा कर सकता है।
राज्यपाल के पास विधेयकों पर हस्ताक्षर न करने का अधिकार है,
लेकिन भाषण में बीच में छोड़कर जाना असामान्य है।
कांग्रेस ने राज्यपाल को हटाने की मांग की है, जबकि भाजपा ने इसे “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” बताया।
आगे क्या होगा?
विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने हितों की रक्षा में अड़े हैं।
कर्नाटक में यह पहली बार नहीं है जब राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव हुआ है,
लेकिन इस बार की तीव्रता ने राजनीतिक पारा बढ़ा दिया है।
यह घटना भारतीय लोकतंत्र में राज्यपाल की भूमिका और संघ-राज्य संबंधों पर नए सवाल खड़े कर रही है।