साइबर ठगी
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में साइबर ठगी का एक बड़ा और संगठित नेटवर्क सामने आया है, जिसने पुलिस और आम जनता दोनों को चौंका दिया है। इस नेटवर्क में खास बात यह सामने आई कि इसमें ऐसे युवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा था जो पहले नेटवर्क मार्केटिंग कंपनियों से जुड़े रहे थे। इन युवाओं को म्यूल खाते खुलवाने का टास्क दिया जाता था, जिनके जरिए ठगी की रकम को इधर-उधर ट्रांसफर किया जाता था।
क्या है म्यूल खाता और कैसे होता है इस्तेमाल
म्यूल खाता वह बैंक खाता होता है जिसे किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर खुलवाया जाता है और उसका उपयोग अवैध लेन-देन के लिए किया जाता है। साइबर अपराधी इन खातों का इस्तेमाल ठगी से प्राप्त रकम को ट्रांसफर करने और उसे छिपाने के लिए करते हैं। इससे असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना पुलिस के लिए काफी मुश्किल हो जाता है।
पुलिस ने किया दो गिरोह का पर्दाफाश
हाल ही में एम्स और खोराबार थाना पुलिस ने साइबर ठगी से जुड़े दो अलग-अलग गिरोहों का खुलासा किया है। पुलिस ने इन गिरोहों के कई गुर्गों को गिरफ्तार किया है, जो लोगों को झांसे में लेकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाते थे। इन खातों के जरिए ठगी की रकम को ठिकाने लगाया जाता था।
नेटवर्क मार्केटिंग से जुड़े युवाओं का इस्तेमाल
जांच में सामने आया है कि इन गिरोहों में ऐसे युवाओं को शामिल किया जाता था जो पहले नेटवर्क मार्केटिंग कंपनियों में काम कर चुके थे। इन युवाओं को लोगों को प्रभावित करना और झांसे में लेना अच्छी तरह आता था। यही कौशल इन गिरोहों के लिए फायदेमंद साबित हुआ और उन्होंने इसे ठगी के काम में इस्तेमाल किया।
ग्रामीण महिलाओं को बनाया जाता था निशाना
खोराबार थाना पुलिस ने जिन आरोपियों को पकड़ा, वे ग्रामीण महिलाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का झांसा देते थे। इसके बाद उनके दस्तावेज लेकर बैंक खाते खुलवाते थे। बाद में इन खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम को ट्रांसफर करने में किया जाता था। इतना ही नहीं, इस रकम को आगे यूएसडीटी और अन्य क्रिप्टो करेंसी में बदल दिया जाता था ताकि ट्रैक करना और भी मुश्किल हो जाए।
लोन दिलाने के नाम पर भी ठगी
एम्स थाना क्षेत्र में सक्रिय गिरोह लोगों को लोन दिलाने का लालच देकर उनके बैंक खाते खुलवाता था। इसके लिए फर्जी दस्तावेज और स्टांप का इस्तेमाल किया जाता था। इसके बाद उन्हीं खातों में
ठगी की रकम डाली जाती थी और फिर उसे निकालकर आगे भेज दिया जाता था।
आरोपियों की पहचान
पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें वंश निषाद, शोभित गौड़, शक्ति जायसवाल,
शिवम पटवा, ध्रुव साहनी, सूरज सिंह, अजय उपाध्याय, अखंड प्रताप सिंह,
बृजेंद्र कुमार सिंह, अभिषेक कुमार यादव और अमर कुमार निषाद शामिल हैं।
ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े हुए थे और संगठित तरीके से इस अपराध को अंजाम दे रहे थे।
काम का बंटवारा और कमीशन सिस्टम
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क में
हर व्यक्ति का काम तय था। कोई सिम कार्ड निकालता था,
कोई बैंक खाता खुलवाता था और कोई ठगी की रकम को निकालकर आगे भेजता था।
इस पूरे काम के लिए प्रत्येक आरोपी को सात से आठ हजार रुपये तक का कमीशन दिया जाता था।
गोरखपुर में सामने आया यह साइबर ठगी का मामला यह दिखाता है कि अपराधी किस तरह नए-नए तरीके
अपनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं। खासकर बेरोजगार युवाओं को
लालच देकर अपराध में शामिल करना एक गंभीर चिंता का विषय है।
ऐसे में आम लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है और अपने
बैंक दस्तावेज किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा नहीं करने चाहिए।
