71 साल पहले चली पहली एसी ट्रेन
पूर्वोत्तर रेलवे के इतिहास में आज का दिन बेहद खास माना जाता है। करीब 71 वर्ष पहले, 1 अप्रैल 1955 को एनईआर की पटरी पर पहली एसी ट्रेन ‘अवध तिरहुत मेल’ दौड़ी थी। यह ट्रेन उस दौर में यात्रियों के लिए एक बड़ी सुविधा और आधुनिकता का प्रतीक मानी जाती थी। रेलवे के विकास की इस कहानी में यह ट्रेन एक अहम मील का पत्थर साबित हुई।
क्या थी अवध तिरहुत मेल
अवध तिरहुत मेल उस समय की एक महत्वपूर्ण ट्रेन थी, जो छोटी लाइन (मीटर गेज) पर चलती थी। यह ट्रेन गुवाहाटी से लखनऊ के बीच गोरखपुर, बस्ती और गोंडा होते हुए संचालित होती थी। उस दौर में इतनी लंबी दूरी की यात्रा के लिए एसी कोच की सुविधा मिलना एक बड़ी बात थी।
तीन अंकों का था नंबर
उस समय रेलवे व्यवस्था आज की तरह व्यवस्थित नहीं थी। अलग-अलग क्षेत्रों में रेलवे एजेंट ट्रेनों का संचालन करते थे। इसलिए ट्रेनों की पहचान के लिए तीन अंकों का नंबर दिया जाता था। अवध तिरहुत मेल का नंबर 301 अप और 302 डाउन था। यह नंबरिंग सिस्टम यात्रियों और रेलवे प्रशासन के लिए ट्रेनों की पहचान आसान बनाता था।
रेलवे का राष्ट्रीयकरण और बदलाव
1950 के बाद भारतीय रेलवे का राष्ट्रीयकरण हुआ, जिससे रेलवे प्रणाली में बड़े बदलाव आए। धीरे-धीरे ट्रेनों की संख्या बढ़ने लगी और तीन अंकों की जगह चार और फिर पांच अंकों के नंबर दिए जाने लगे। इससे रेलवे संचालन और अधिक सुव्यवस्थित हो गया।
एसी कोच की शुरुआत
अवध तिरहुत मेल में एसी कोच लगाए गए थे, जो उस समय के हिसाब से एक बड़ी सुविधा थी।
इससे यात्रियों को आरामदायक यात्रा का अनुभव मिला और रेलवे में आधुनिक सुविधाओं की शुरुआत हुई।
यह कदम रेलवे के विकास और यात्रियों की सुविधा के लिए एक बड़ा बदलाव था।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में जिक्र
पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार सिंह के संपादन में प्रकाशित पुस्तक
“छोटी लाइन: ए जर्नी ऑफ ट्रांसफार्मेशन” में इस ट्रेन का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
इसमें बताया गया है कि कैसे यह ट्रेन अपने समय में एक नई शुरुआत का प्रतीक बनी।
ब्रॉड गेज के बाद बदलाव
समय के साथ रेलवे लाइनों का ब्रॉड गेज में परिवर्तन हुआ और
ट्रेनों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। इसके साथ ही
ट्रेन नंबरिंग सिस्टम में भी बदलाव आया और तीन
अंकों से बढ़ाकर चार और पांच अंकों का सिस्टम लागू किया गया।
अवध तिरहुत मेल केवल एक ट्रेन नहीं थी, बल्कि भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण की शुरुआत का प्रतीक थी।
आज जब हम आधुनिक ट्रेनों और हाईटेक सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं, तो
यह याद रखना जरूरी है कि इसकी नींव ऐसे ही ऐतिहासिक प्रयासों से रखी गई थी
