गोरखपुर आरोग्य मेला 2025
गोरखपुर जिले के सहजनवा तहसील क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद में आयोजित
आरोग्य मेला केवल कागजों तक सिमट गया, जहां न तो मरीज पहुंचे और न ही डॉक्टर या स्टाफ।
रविवार को ग्राम पंचायत रिठुआखोर के नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में होने वाले इस मेले में सिर्फ एक फार्मासिस्ट की मौजूदगी ने
गोरखपुर आरोग्य मेला की विफलता को उजागर कर दिया। सरकारी निर्देशों की खुलेआम अवहेलना से ग्रामीणों में भारी निराशा है,
और अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ग्रामीण स्वास्थ्य योजनाएं महज दिखावा बनकर रह गई हैं?
आरोग्य मेला का उद्देश्य: ग्रामीणों तक पहुंचाने वाली स्वास्थ्य सुविधाएं
आरोग्य मेला उत्तर प्रदेश सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका मुख्य लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में निःशुल्क स्वास्थ्य जांच,
दवाएं और विशेषज्ञ परामर्श प्रदान करना है। हर रविवार को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों
(पीएचसी) में आयोजित होने वाले इन मेलों में डॉक्टर, एएनएम (ऑक्जिलरी नर्स मिडवाइफ), फार्मासिस्ट और अन्य स्टाफ की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
मुख्यमंत्री के निर्देश स्पष्ट हैं – किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन गोरखपुर के पाली ठर्रापार क्षेत्र में यह योजना धरातल पर फेल साबित हुई।
सुबह होते ही ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए केंद्र पहुंचे, लेकिन परिसर सूना पड़ा था। न कोई मरीज, न डॉक्टर की आवाजाही,
न एएनएम की फाइलें। सिर्फ एक फार्मासिस्ट अकेला खड़ा था, जो दवाओं के रजिस्टर में कुछ नोटिस कर रहा था।
स्थानीय ग्रामीण रामप्रताप ने बताया, “हम लोग दूर-दूर से आते हैं, लेकिन स्टाफ गायब। अब कौन करेगा जांच? क्या यही है आरोग्य मेला 2025 की सच्चाई?”
एक अन्य ग्रामीण सीता देवी ने कहा, “बच्चों की बीमारी के लिए आए थे, लेकिन निराश होकर लौट पड़े। स्वास्थ्य विभाग सो रहा है क्या?”
स्टाफ अनुपस्थिति के पीछे क्या कारण? विभागीय लापरवाही या संसाधन की कमी?
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह कोई पहला मामला नहीं है। गोरखपुर जिले में आरोग्य मेला की अनियमितता
लंबे समय से चली आ रही है। स्टाफ की कमी, ड्यूटी रोटेशन में गड़बड़ी और अधिकारियों की उदासीनता मुख्य कारण बताए जा रहे हैं।
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “कागजों पर तो सब कुछ ठीक है, लेकिन जमीन पर स्टाफ उपलब्ध नहीं होता।
ट्रांसफर-पोस्टिंग के चक्कर में डॉक्टर अनुपस्थित रहते हैं।” इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन की समस्या भी मरीजों को दूर रखती है।
लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार आयुष्मान भारत योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत करोड़ों रुपये
खर्च कर रही है, तो फिर यह लापरवाही क्यों?
इस घटना ने उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी
अनियमितताएं ग्रामीणों के स्वास्थ्य को खतरे में डाल रही हैं। डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसी पुरानी बीमारियों की जांच
यहीं होती है, लेकिन अनुपस्थिति से लोग प्राइवेट क्लिनिकों की ओर भागते हैं, जो महंगे पड़ते हैं।
एक सर्वे के अनुसार, गोरखपुर जैसे जिलों में 40% से अधिक ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर स्टाफ की कमी है।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया: जांच का आश्वासन, लेकिन कब तक सुधार?
जब इस मामले की जानकारी दी गई, तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाली के अधीक्षक डॉ. सतीश सिंह ने कहा,
“हमें इसकी शिकायत मिली है। मामले की तत्काल जांच कराई जाएगी और दोषी स्टाफ के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
भविष्य में ऐसी लापरवाही नहीं होने दी जाएगी।” लेकिन ग्रामीणों का विश्वास कम है।
वे मांग कर रहे हैं कि न केवल जांच हो,
बल्कि नियमित मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जाए। जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से भी कोई आधिकारिक बयान
नहीं आया है, लेकिन अपेक्षा है कि गोरखपुर प्रशासन इस पर त्वरित कदम उठाएगा।
आगे की राह: मजबूत निगरानी से सशक्त बने आरोग्य मेला
गोरखपुर आरोग्य मेला स्टाफ अनुपस्थिति जैसी घटनाएं स्वास्थ्य सेवाओं की जड़ को कमजोर करती हैं।
सरकार को चाहिए कि डिजिटल ट्रैकिंग ऐप के माध्यम से स्टाफ की उपस्थिति सुनिश्चित करे। साथ ही,
ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए एसएमएस अलर्ट और वैन सर्विस शुरू की जाए।
यदि समय रहते सुधार नहीं हुए,
तो यह योजना विफल हो सकती है।
आखिरकार, स्वस्थ ग्रामीण ही मजबूत भारत का आधार हैं।
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