उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले की एक छोटी-सी बस्ती में आज एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यहाँ की युवा शिक्षिका गरिमा मिश्रा ने अपने प्रयासों से उन बच्चों के जीवन में नई रोशनी जलाई है, जिनके माता-पिता कभी नहीं सोच सकते थे कि उनके बच्चे भी स्कूल जा पाएंगे। आर्थिक तंगी, सामाजिक बाधाएँ और शिक्षा से दूरी—इन सभी अवरोधों को पार करते हुए गरिमा ने यह साबित कर दिया है कि एक व्यक्ति की निष्ठा और इच्छाशक्ति समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकती है।
गरीब परिवारों में शिक्षा की अलख
गरिमा का सफर कुछ वर्षों पहले शुरू हुआ जब उन्होंने अपने इलाके के छोटे बच्चों को सड़क के किनारे खेलते देखा। पूछने पर पता चला कि वे स्कूल नहीं जाते, क्योंकि उनके माता-पिता मजदूर हैं और फीस, किताबें या यूनिफॉर्म का खर्च उठा नहीं सकते। यह दृश्य गरिमा को भीतर तक छू गया।
उन्होंने तय किया कि वह खुद इन बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देंगी।शुरुआत में उन्होंने अपने घर के आंगन में पाँच बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी लगन और ईमानदारी देखकर लोग जुड़ते चले गए। आज उनके पास 40 से अधिक बच्चे हैं जो नियमित रूप से पढ़ने आते हैं। इनमें से कई बच्चे आज प्राइवेट स्कूलों में छात्रवृत्ति पाकर पढ़ाई जारी रख रहे हैं।

अपने बलबूते खड़ी की “गरिमा पाठशाला
”गरिमा ने इस पहल का नाम रखा — “गरिमा पाठशाला”। यह कोई बड़ी इमारत नहीं है, बल्कि एक सादा-सा टीनशेड का कमरा है जिसमें एक ब्लैकबोर्ड, कुछ बेंचें और बच्चों के सपनों की जगमगाहट है। शुरुआत में उन्होंने अपने वेतन से बच्चों के लिए किताबें और स्टेशनरी खरीदी। बाद में गाँव के कुछ जागरूक लोगों ने भी मदद करना शुरू किया
।इस पाठशाला में न केवल बच्चों को हिंदी, इंग्लिश, गणित और विज्ञान पढ़ाया जाता है, बल्कि नैतिक शिक्षा, स्वच्छता और संस्कारों का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। गरिमा मानती हैं कि सच्ची शिक्षा वही है जो बच्चे को अच्छा इंसान बनाए।
महिला सशक्तिकरण की मिसाल
लखीमपुर जैसे अर्ध-ग्रामीण क्षेत्र में एक युवती के लिए इस तरह की पहल चलाना आसान नहीं था। शुरुआत में कई लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया। कुछ ने कहा — “इन गरीब बच्चों को पढ़ाने से क्या होगा?” मगर गरिमा ने किसी की बातों पर ध्यान नहीं दिया।
उनके हौसले और मेहनत ने धीरे-धीरे आलोचनाओं को तालियों में बदल दिया।आज वही लोग अपने बच्चों को “गरिमा पाठशाला” में भेजना चाहते हैं। गरिमा न केवल शिक्षिका हैं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की प्रतीक बन चुकी हैं। उन्होंने यह दिखाया है कि अगर किसी महिला को अवसर और आत्मविश्वास मिले, तो वह अपने समाज के भविष्य को भी बदल सकती है।