गोरखपुर में बीआरडी मेडिकल कॉलेज के आसपास ‘मरीज माफिया’ का एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय है, जो गंभीर मरीजों को सरकारी अस्पतालों से निजी अस्पतालों में भेजने का काम करता है. यह गोरखधंधा रात के समय और भी तेज़ हो जाता है, जिसमें एंबुलेंस चालक, दलाल और कुछ निजी अस्पतालों के कर्मचारी शामिल होते हैं. [1, 2]
मरीज माफिया का modus operandi:
- निशाना बनाना: जब कोई गंभीर मरीज बीआरडी मेडिकल कॉलेज या किसी अन्य सरकारी अस्पताल में आता है, तो मरीज माफिया के सदस्य, जिनमें एंबुलेंस चालक और बिचौलिए शामिल होते हैं, उन्हें अपना निशाना बनाते हैं.
- बहकाना और डराना: मरीज की गंभीर हालत को देखकर एंबुलेंस चालक या बिचौलिए परिजनों को बहकाते हैं कि सरकारी अस्पताल में सही इलाज नहीं मिल पाएगा. वे उन्हें निजी अस्पताल में ले जाने के लिए तैयार करते हैं, अक्सर डराकर या लालच देकर.
- कमीशन का खेल: मरीज की बीमारी जितनी गंभीर होती है, कमीशन की रकम उतनी ही अधिक तय होती है. गंभीर मरीजों को निजी अस्पताल में भर्ती कराने पर बिचौलियों को 15 से 25 हजार रुपये तक का कमीशन मिलता है, जबकि सामान्य मरीजों के लिए यह रकम 5 से 10 हजार रुपये तक होती है.
- अस्पताल कर्मचारियों की मिलीभगत: इस धंधे में कई बार निजी अस्पतालों के कर्मचारी भी शामिल होते हैं. जैसे ही उन्हें किसी आर्थिक रूप से सक्षम मरीज के बारे में पता चलता है, वे बिचौलियों से संपर्क साधते हैं और मरीज को निजी अस्पताल में भेजने की व्यवस्था करते हैं。 [1, 2]
पुलिस की कार्रवाई और उसका असर:
- हाल ही में पुलिस ने इस एंबुलेंस माफिया पर शिकंजा कसा है. बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पास घूम रही पांच एंबुलेंसों को जब्त कर लिया गया.
- इस कार्रवाई के बाद पुलिस ने रात में गश्त बढ़ा दी है, जिससे एंबुलेंस माफिया की गतिविधियों में काफी कमी आई है.
- हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि अभी भी रात में बिचौलिए सक्रिय रहते हैं. एंबुलेंस चालकों के लिए यह आय का एक बड़ा जरिया बन चुका है, जिसके कारण वे मरीजों को सरकारी अस्पताल तक पहुंचाने की बजाय निजी अस्पतालों की ओर मोड़ देते हैं. [1]
समस्या की जड़:
- गोरखपुर में आसपास के जिलों के साथ-साथ नेपाल से भी मरीज इलाज के लिए आते हैं, जिससे जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में भीड़ रहती है. [2]
- हास्पिटल माफिया का गिरोह कैंट, शाहपुर और रामगढ़ताल क्षेत्रों में सक्रिय है. [1, 2]
- सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों पर दलालों की नजर रहती है, और अस्पताल कर्मचारियों की मिलीभगत से मरीजों को अच्छे इलाज का झांसा देकर निजी अस्पतालों में “बेचा” जाता है. [2]
- इस समस्या को लेकर शहर में कई बार बवाल भी हुआ है, यहां तक कि कमिश्नर और डीआईजी आवास के सामने गोली चलने की घटना भी हुई है, लेकिन माफिया पर पूरी तरह से शिकंजा कसने में प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं. [2]
- पिछले 10 महीनों में कई अवैध रूप से चल रहे अस्पतालों पर कार्रवाई हुई है, लेकिन माफिया पर इसका खास असर नहीं पड़ा है. [2]
यह पूरा नेटवर्क मरीजों और उनके परिजनों की मजबूरी का फायदा उठाता है, जिससे उन्हें आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है. इस समस्या से निपटने के लिए पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर और अधिक प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है.