राष्ट्रपति और राज्यपाल पर समयसीमा थोपने से होगी सांविधानिक अव्यवस्था
केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के उठाए सवालों का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति और राज्यपाल पर विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समयसीमा थोपने से सांविधानिक अव्यवस्था पैदा होगी। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत के फैसले पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संदर्भ में उठाए सवालों पर अपने जवाब में यह बात कही है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल लिखित जवाब में केंद्र ने कहा, किसी भी संस्था की कल्पना, निश्चितता या चूक किसी अन्य संस्था को नई शक्तियां प्रदान करने का औचित्य नहीं ठहरा सकता है, जो संविधान ने उसे दी ही नहीं हैं। यदि किसी संस्था की जटिलता या संस्थागत असंतोष के बहाने या संविधान के आदेशों से प्राप्त ऑडिटरी के आधार पर किसी अन्य संस्था को अतिरिक्त शक्ति दे दी जाती है, तो इसका परिणाम सांविधानिक अव्यवस्था होगा।
केंद्र ने कहा, शायद संविधान निर्माताओं ने संभावित विलंब को ध्यान में रखते हुए ही राष्ट्रपति के पास कोई समयसीमा लागू करने का प्रावधान नहीं रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर 19 जनवरी को सुनवाई शुरू की थी। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र और राज्य की सरकारों से राष्ट्रपति के संदर्भ पर लिखित टिप्पणियां मांगी थीं।
केंद्र ने तर्क दिया, शीर्ष कोर्ट के निश्चित समयसीमा लागू करने से संविधान का स्थापित नाजुक संतुलन भंग हो जाएगा। नाजुक संतुलन का तात्पर्य कानून का शासन टिकाए रखने से है, यदि कोई चूक हो, तो उसका समाधान सांविधानिक रूप से स्वीकार्य तरीकों द्वारा किया जाना चाहिए।
जैसे चुनाव जवाबदेही, विधायी निरंकुशता, कार्यपालिका जिम्मेदारी, संदर्भ प्रक्रिया और न्यायपालिका के बीच पारस्परिक प्रक्रिया।
केंद्र ने कहा, अनुच्छेद 142 में कोर्ट को ऐसे मामले सुलझाने का अधिकार है, जिनमें सांविधानिक प्रावधान मौन हों, लेकिन इससे विधायी प्रक्रिया उलट जाती है।