16 जनवरी 2026 को फ्रांस की राजधानी पेरिस की साफ-सुथरी और ऐतिहासिक सड़कों पर एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जो पिछले कई दशकों में दुर्लभ रहा। हजारों किसानों ने अपने ट्रैक्टरों के साथ शहर को घेर लिया और संसद भवन (नेशनल असेंबली) के ठीक सामने सड़क पर टनों आलू बिछाकर विरोध जताया। यह प्रदर्शन फ्रेंच किसान यूनियनों (FNSEA, Jeunes Agriculteurs और Coordination Rurale) द्वारा आयोजित किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय संघ (EU) की नई कृषि नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करना था।
प्रदर्शन की शुरुआत और भव्यता
सुबह से ही पेरिस के प्रमुख मार्गों जैसे शैंप्स-एलिसेज, बुलेवार्ड पेरिफेरिक और नेशनल असेंबली के आसपास ट्रैक्टरों का लंबा काफिला जमा होने लगा। अनुमानित 4,000 से 5,000 ट्रैक्टरों ने शहर की यातायात को पूरी तरह ठप कर दिया। किसानों ने ट्रैक्टरों पर बैनर लगाए, जिन पर लिखा था:
- “EU नीतियां हमें बर्बाद कर रही हैं”
- “सब्सिडी कटौती नहीं, किसान बचाओ”
- “हमारी फसल, हमारा हक”
प्रदर्शन का सबसे आकर्षक और प्रतीकात्मक हिस्सा था संसद के सामने सड़क पर टनों आलू बिछाना। किसानों ने कहा कि यह “हमारी मेहनत का अपमान है, क्योंकि बाजार में उत्पादन लागत से भी कम दाम मिल रहे हैं।” आलू फ्रांस के प्रमुख कृषि उत्पादों में से एक है और यह कदम EU की पर्यावरण नीतियों और आयात नियमों के खिलाफ सीधा संदेश था।
मुख्य मांगें और कारण
फ्रेंच किसानों की प्रमुख मांगें निम्नलिखित थीं:
- EU ग्रीन डील के तहत सब्सिडी में प्रस्तावित कटौती को तुरंत रोकना
- उत्पादन लागत (खासकर डीजल, उर्वरक और बीज) पर नियंत्रण और सब्सिडी बढ़ाना
- यूक्रेन से सस्ते आयात पर सख्त नियम लगाना
- न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी
किसान संगठनों का कहना है कि EU की नई नीतियां छोटे और मध्यम किसानों को बर्बाद कर रही हैं, जबकि बड़े कॉर्पोरेट फार्म्स को फायदा हो रहा है। पिछले कुछ महीनों में कई क्षेत्रों में आत्महत्या के मामले भी बढ़े हैं, जिसने आंदोलन को और तेज किया।
यातायात और सुरक्षा व्यवस्था पर असर
प्रदर्शन के कारण पेरिस में बड़े पैमाने पर ट्रैफिक जाम लगा। मेट्रो और बस सेवाएं प्रभावित हुईं, जबकि पुलिस ने भारी संख्या में बल तैनात किया। हालांकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन कुछ जगहों पर छोटी-मोटी झड़प की खबरें भी आईं। फ्रांसीसी सरकार ने कहा कि वह किसानों की मांगों पर विचार कर रही है, लेकिन अभी कोई ठोस घोषणा नहीं की गई।
भारत के किसान आंदोलन से तुलना
दुनिया भर के मीडिया और विशेषज्ञों ने इस प्रदर्शन की तुलना भारत के 2020-2021 के किसान आंदोलन से की। ट्रैक्टरों का इस्तेमाल, सड़क जाम और प्रतीकात्मक विरोध (भारत में टोल प्लाजा पर धरना, यहां आलू बिछाना) ने इसे ‘ट्रैक्टर क्रांति 2.0’ का नाम दिया। कई भारतीय किसान संगठनों ने भी सोशल मीडिया पर फ्रेंच किसानों के साथ एकजुटता जताई।
वैश्विक कृषि संकट की झलक
पेरिस किसान प्रदर्शन 2026 सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि पूरे यूरोप और
विश्व में बढ़ते कृषि संकट का प्रतीक बन गया है।
जब तक सरकारें और EU किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं निकालेंगी, ऐसे प्रदर्शन जारी रहेंगे।
फ्रांस की सड़कों पर बिछी आलुओं की चादर न सिर्फ विरोध का प्रतीक है,
बल्कि यह चेतावनी भी है कि किसान अब चुप नहीं रहेंगे।