स्नेकहेड मछली का बाजार में धमाल
उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में मछली पालन अब केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन बदलने वाला साधन बन चुका है। खासकर स्नेकहेड मछली (मुरेल या चन्ना स्ट्रिएटा) की कीमतों में आई भारी उछाल ने पालकों की किस्मत पलट दी है। वर्तमान में इसकी खुदरा कीमत 800-1200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जबकि थोक बाजार में 500-700 रुपये किलो मिल रहा है। कोविड के बाद पोषण जागरूकता, निर्यात में वृद्धि और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती समझ के कारण मांग में तेजी आई है। वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, पटना और मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्रों में तालाबों में स्नेकहेड पालन से पालक अब अपनी लागत का 3-4 गुना मुनाफा कमा रहे हैं। यह मछली न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि उच्च प्रोटीन, ओमेगा-3 और कम कैलोरी वाली होने से बाजार में डिमांड लगातार बढ़ रही है।
सफल कहानियां: लाखों की कमाई के उदाहरण
वाराणसी के रामनगर क्षेत्र के किसान रामेश्वर यादव ने दो साल पहले 2 एकड़ तालाब में स्नेकहेड मछली पालन शुरू किया। शुरुआती निवेश लगभग 5 लाख रुपये था, जिसमें बीज मछली, चारा, तालाब की मरम्मत और अन्य खर्च शामिल थे। आज उनकी पूरी फसल बिक चुकी है और उन्हें 18 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ है। रामेश्वर बताते हैं, “पहले कीमत 300 रुपये किलो थी, अब 900 रुपये मिल रही है। यह चमत्कार जैसा लगता है। परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल गई है।”
इसी तरह बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सुनील कुमार ने 1 लाख बीज मछलियों से पालन शुरू किया। 8-9 महीने में उन्होंने 40 टन उत्पादन हासिल किया और बाजार में बिक्री से 12 लाख रुपये कमाए। सुनील कहते हैं, “स्नेकहेड की तेज ग्रोथ और कम रोग होने से जोखिम बहुत कम है। सरकार की सब्सिडी ने भी बहुत मदद की।” ये कहानियां ग्रामीण युवाओं और किसानों के बीच नया उत्साह भर रही हैं। स्नेकहेड पालन से कई परिवारों ने कर्ज मुक्ति पाई है और नए निवेश कर रहे हैं।
स्नेकहेड पालन की खासियत और लाभ
स्नेकहेड मछली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 6-8 महीने में marketable साइज (1-1.5 किलो) तक पहुंच जाती है। इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत अच्छी है और यह कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी जीवित रह सकती है। यह मांसाहारी होने के कारण तेजी से बढ़ती है। पालक इसे पॉलीकल्चर में भी रख सकते हैं, लेकिन शुद्ध स्नेकहेड पालन में मुनाफा ज्यादा होता है। बाजार में इसकी मांग होटलों, निर्यातकों और स्वास्थ्य जागरूक उपभोक्ताओं से आ रही है।
सरकार की योजनाएं: PMMSY का बड़ा योगदान
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) इस क्षेत्र में गेम-चेंजर साबित हो रही है। उत्तर प्रदेश में 2025-26 के लिए
5000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। इसके तहत तालाब निर्माण, बीज मछली, चारा,
प्रशिक्षण और उपकरणों पर 40-60% तक सब्सिडी मिल रही है।
नए पालक आसानी से लोन और अनुदान प्राप्त कर रहे हैं।
बिहार में भी इसी योजना के तहत हजारों तालाब विकसित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि
स्नेकहेड पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सबसे तेज रास्ता है।
निष्कर्ष: ग्रामीण भारत की नई उम्मीद
स्नेकहेड मछली की उछलती कीमतों ने उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में
हजारों परिवारों की किस्मत बदली है। जहां पहले पलायन और बेरोजगारी बड़ी समस्या थी,
वहीं अब मछली पालन से आत्मनिर्भरता और समृद्धि की नई कहानियां लिखी जा रही हैं।
यदि सरकार की योजनाएं और बाजार की मांग इसी तरह बनी रही