यूपी में गिग वर्करों का शोषण बेनकाब: 15 लाख में सिर्फ 10% पंजीकृत, अब कंपनियों पर कसेगा शिकंजा

उत्तर प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के बीच एक बड़ा मुद्दा सामने आया है—शोषण और अधिकारों की कमी। राज्य में करीब 15 लाख गिग वर्कर विभिन्न ऑनलाइन कंपनियों (एग्रीगेटर्स) से जुड़े हुए हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल लगभग 10 प्रतिशत ही पंजीकृत हैं। इस असंतुलन के चलते कंपनियां इन श्रमिकों का फायदा उठा रही हैं।

गिग वर्कर कौन हैं और क्यों बढ़ रही है संख्या?

गिग वर्कर वे लोग होते हैं जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए काम करते हैं, जैसे डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर, फ्रीलांसर आदि। ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों के विस्तार के साथ इनकी संख्या तेजी से बढ़ी है।

हालांकि इनकी सेवाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन इनके अधिकार, सुरक्षा और सुविधाएं अभी भी सीमित हैं। यही वजह है कि अब सरकार ने इस दिशा में गंभीर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

पंजीकरण की कमी बनी सबसे बड़ी समस्या

श्रम विभाग के अनुसार, प्रदेश में गिग वर्करों का पंजीकरण बेहद कम है। 15 लाख श्रमिकों में से केवल 10 प्रतिशत का ही रजिस्ट्रेशन होना यह दर्शाता है कि बड़ी संख्या में वर्कर सिस्टम से बाहर हैं।

इसका फायदा कंपनियां उठा रही हैं, क्योंकि बिना पंजीकरण के श्रमिकों को कोई कानूनी सुरक्षा या अधिकार नहीं मिल पाते। इससे वे वेतन, बीमा और अन्य सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।

श्रम विभाग का सख्त रुख

गिग वर्करों के शोषण की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए श्रम विभाग ने अब सख्ती बढ़ा दी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि अब कंपनियों की जवाबदेही तय की जाएगी और पंजीकरण प्रक्रिया को अनिवार्य बनाने पर जोर दिया जाएगा।

इसके अलावा, कंपनियों द्वारा एकतरफा फैसले लेने की प्रक्रिया में भी बदलाव किया जा रहा है,

ताकि श्रमिकों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिल सके।

कंपनियों पर बढ़ेगी जवाबदेही

नई व्यवस्था के तहत अब ऑनलाइन कंपनियों को

यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके साथ जुड़े सभी गिग वर्कर पंजीकृत हों।

साथ ही श्रमिकों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय होने पर उनकी सुनवाई सुनिश्चित की जाएगी।

यह कदम गिग वर्करों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है, क्योंकि

अब उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने में कानूनी समर्थन मिलेगा।

सामाजिक सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम

राज्य सरकार का यह निर्णय गिग वर्करों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में

एक अहम पहल माना जा रहा है। इससे उन्हें बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य लाभ मिलने की संभावना बढ़ेगी।

इसके साथ ही यह कदम श्रमिकों के जीवन स्तर को

सुधारने और उन्हें सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां देने में भी मदद करेगा।

गिग इकोनॉमी में बदलाव की शुरुआत

यह पहल न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकती है।

गिग इकोनॉमी में काम करने वाले लाखों लोगों के लिए यह बदलाव एक नई उम्मीद लेकर आया है।

यदि यह व्यवस्था सही तरीके से लागू होती है, तो आने वाले समय में

गिग वर्करों के अधिकारों में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश में गिग वर्करों के शोषण का मुद्दा अब सामने आ चुका है और सरकार ने

इस पर सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। पंजीकरण को अनिवार्य बनाना और

कंपनियों की जवाबदेही तय करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

यह बदलाव गिग वर्करों के जीवन में सकारात्मक असर डाल सकता है और

उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण प्रदान कर सकता है।