उत्तर प्रदेश में जमीन या संपत्ति की रजिस्ट्री होते ही उसकी वास्तविक जांच यानी भूमि विवरण, पूर्व स्वामित्व, और सरकारी रिकॉर्ड से मिलान की प्रक्रिया शुरू होती है। इसे “सत्यापन” कहा जाता है।
यह काम राजस्व विभाग, उपजिलाधिकारी (SDM) और तहसील कार्यालय मिलकर करते हैं। पहले इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं थी, जिसके कारण फाइलें महीनों तक अटकी रहती थीं। इससे कई बार भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप लगते थे।अब सरकार ने यह स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किया है कि रजिस्ट्री के बाद 3 माह के भीतर ही सत्यापन का कार्य पूरा किया जाए।
देरी होने पर इसका जवाबदेह संबंधित अधिकारी होगा।निर्णय का उद्देश्यमुख्य उद्देश्य यह है कि ईमानदार संपत्ति मालिकों को राहत मिल सके और अनावश्यक देरी की वजह से उन पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।
आमतौर पर देखा गया है कि सत्यापन रिपोर्ट लेट होने पर अधिकारी खुले में या अप्रत्यक्ष रूप से “रिपोर्ट जल्दी कराने” के नाम पर वसूली करते थे। नई नीति से यह प्रवृत्ति रुकने की उम्मीद है।इसके अलावा, यह बदलाव “ई-गवर्नेंस” के उस लक्ष्य से भी जुड़ा है, जिसमें भूमि रिकॉर्ड को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाने की योजना चल रही है।
लाभ संपत्ति मालिकों को कैसे मिलेगासमय की बचत होगी: रजिस्ट्री के बाद लोगों को महीनों पता नहीं होता था कि उनकी जमीन का सत्यापन हुआ या नहीं। अब तीन माह में ही परिणाम तय होना है।भ्रष्टाचार पर रोक: देरी का बहाना बनाकर जो अधिकारी अवैध धन लेते थे, अब उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।सरकारी रिकॉर्ड तेज अपडेट होंगे: राजस्व अभिलेख, खतौनी और भूलेख पोर्टल पर नए स्वामी का नाम जल्द दर्ज होगा।
लोन और निर्माण की सुविधा: जब स्वामित्व शीघ्र प्रमाणित हो जाएगा, तब मालिक आसानी से बैंक से ऋण या नक्शा पास करवाने की प्रक्रिया शुरू कर सकेंगे।प्रक्रिया में हुआ तकनीकी सुधारराजस्व विभाग ने भूमि-सत्यापन को ऑनलाइन मोड में तेज करने के लिए ‘Bhu-Naksha’ और ‘Dharani Portal’ जैसी प्रणालियों के उपयोग को अनिवार्य किया है।
अब फाइलें डिजिटल रूप में आगे बढ़ेंगी, जिससे मैन्युअल देरी और मानवीय हस्तक्षेप में कमी आएगी।प्रत्येक संपत्ति की यूनिक आईडी होगी, जिसके जरिए आवेदक अपने मोबाइल या वेबसाइट से यह जान सकेगा कि फाइल किस स्तर पर है। एसडीएम, तहसीलदार और भूमि अधिकारी के कार्य की डिजिटल निगरानी होगी।जवाबदेही और दंड का प्रावधानयदि तीन माह में सत्यापन संपन्न नहीं होता, तो शासन संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगेगा।
बिना ठोस कारण समय सीमा पार करना लापरवाही मानी जाएगी। यदि किसी केस में जानबूझकर देरी की गई हो, तो विभागीय कार्रवाई और निलंबन तक हो सकता है। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि व्यवस्था केवल कागजों में न रह जाए।
शासन के लिए संभावित चुनौतियाँहालांकि इस योजना से आमजन को राहत मिलेगी, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कुछ चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं:कई जिलों में स्टाफ की कमी और काम का अत्यधिक बोझ।पुराने रिकॉर्ड डिजिटलीकरण में तकनीकी दिक्कतें।
भूमि विवादों वाले मामलों में जांच में देरी की आशंका।फिर भी सरकार मानती है कि समय सीमा तय होने से कामकाज की गति अपने आप बढ़ेगी और कर्मचारी सतर्क रहेंगे।व्यापक प्रभावयह फैसला उत्तर प्रदेश के रियल एस्टेट क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
पारदर्शी सत्यापन से खरीदारों और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। इससे जमीन की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया तेज और सुरक्षित बनेगी। किसानों और ग्रामीणों को भी अपने पट्टे या नामांतरण के लिए लंबे इंतजार से राहत मिलेगी।शहरी इलाकों में इससे बिल्डरों और प्लॉट धारकों को जल्दी स्वामित्व प्रमाण मिलने से आवासीय परियोजनाओं को भी गति मिलेगी।