
धुरियापार गोरखपुर ऐसा पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल है जो सदियों से केवल एक छोटे‑से गांव की तस्वीर नहीं, बल्कि रामायण, मुगल और ब्रिटिश युग के साक्ष्यों का संगम रहा है। गोरखपुर जनपद मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण दिशा में कुआनो नदी के तट पर स्थित धुरियापार उस धरती का हिस्सा है जहां इतिहास, आस्था और लोक‑कथाओं के धागे एक‑दूसरे से जुड़कर अनोखी पहचान बनाते हैं।
धुरियापार का भौगोलिक स्थान, नाम और प्राचीन परिवेश
मान्यता यह है कि मुगल‑शासन काल में धुरियापार को दरियाबाद के नाम से जाना जाता था, हालांकि इसका कोई ठोस लिखित दस्तावेज़ अभी तक हाथ नहीं लगा है। लोग इस बात पर भरोसा करते हैं कि यह स्थान कभी एक बड़ी राजधानी या रियासत का हिस्सा था, जो समय‑समय पर उजड़‑बस गया और आज भी अपने अवशेषों के साथ जीवित है। यही कारण है कि धुरियापार के कई स्थानों पर आज भी पुरानी दीवारें, जमीन के नीचे छिपे अवशेष और स्थानीय मान्यताएं इतिहास के टुकड़े जोड़ने की कोशिश करती हैं।

धुरियापार गोरखपुर: श्रीराम, बाबा धवलेश्वर नाथ और सुदामा नायक की रहस्यमय धरती
धुरियापार के प्रचलित धार्मिक स्थलों में सबसे प्रमुख स्वयंभू बाबा धवलेश्वर नाथ ज्योतिर्लिंग का नाम आता है। यह ज्योतिर्लिंग कुआनो पुल के पास बना हुआ है और स्थानीय लोगों के लिए न केवल एक मंदिर है, बल्कि आस्था, डर और चमत्कार का केंद्र भी है। मान्यता यह है कि त्रेतायुग में महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए अरण्य की ओर ले जा रहे थे, इसी दौरान वे कुछ देर धुरियापार के कुआनो नदी के तट पर विश्राम करने रुके थे। उसी स्थान पर श्रीराम की पूजा और आराधना के प्रभाव से यह स्वयंभू ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ माना जाता है
भगवान श्रीराम, बाबा धवलेश्वर नाथ और ज्योतिर्लिंग की पौराणिक मान्यता
आज भी यहां श्रावण मास, महाशिवरात्रि और हर सोमवार को रुद्राभिषेक और जलाभिषेक के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु धुरियापार पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सच्चे मन से की गई मनोकामना बाबा धवलेश्वर नाथ अवश्य स्वीकार करते हैं, इसलिए यहां आने वाले लोगों की भक्ति, भय और आस्था का मिश्रण बहुत गहरा होता है।

बाबा धवलेश्वर नाथ और ज्योतिर्लिंग की पौराणिक मान्यता
धवलेश्वर नाथ ज्योतिर्लिंग की सबसे अनोखी विशेषता यह बताई जाती है किजब भी यहां श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं,तो जल की धार सीधे सूर्य की दिशा में ही गिरती है, चाहे वह उत्तरायण हो या दक्षिणायन। यह विशेषताही इस स्थान को चमत्कारी और रहस्यमय बनाती है। इसी रहस्य और अलौकिकता को देखने के लिएअंग्रेजी शासन काल में एक भूगर्भशास्त्री और ब्रिटिश अधिकारी भी यहां आए और इस जागरूक ज्योतिर्लिंग पर शोध करने लगे।
ब्रिटिश‑कालीन खजाना खोज और विस्फोट की रहस्यमय घटना
मान्यता है कि इस भूगर्भशास्त्री ने ज्योतिर्लिंग के नीचे अकूत खजाना छिपा होने की बात ब्रिटिश अधिकारी से कही, जिसके बाद खुदाई और तलाशी की इजाज़त मिल गई। लगभग छह महीने तक कड़े खोज‑पड़ताल और खुदाई के बाद उन्होंने नदी के किनारे से ज्योतिर्लिंग को उड़ाने के लिए विस्फोटक का इस्तेमाल किया। बताया जाता है कि विस्फोट इतना तीव्र था कि आस‑पास के इलाके में भय फैल गया,
लेकिन ज्योतिर्लिंग पर एक भी दरार नहीं आई, न ही उसकी आकृति में कोई बदलाव आया।इस घटना में दर्जनों मजदूरों की जान गई, कई जख्मी हुए और
ब्रिटिश‑कालीन खजाना खोज और विस्फोट की रहस्यमय घटना

कुआनो नदी का पानी उनके खून से लाल हो गया माना जाता है। इस दृश्य को देखकर भूगर्भशास्त्री ने अपने मन पर काबू खो दिया, वह पागल हो गया और बालों व कपड़े नोचता हुआ नदी में कूदकर जान दे दी। यह घटनाब्रिटिश अधिकारियों के लिए भी एक झटके जैसी रही और वे धुरियापार के इस चमत्कारी ज्योतिर्लिंग के प्रति भय और आस्था से भर गए।
धुरियापार आज: श्रद्धालु, टूरिज़्म और डिजिटल ट्रैफिक के क्षेत्र के रूप में
वहीं, धुरियापार न केवल धार्मिक रूप से, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी रोचक है। जनश्रुति के अनुसार मुगल शासन काल में वर्तमान रुकूनपुर गांव में एक साईं (रुकून शाह) रहता था, जिसकी एक अत्यंत सुंदर बेटी थी। उस समय **मालगुजारी वसू
