उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हलचल मच गई है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर फैसला दिल्ली से आने वाला है, जबकि लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बीच हुई रणनीति बैठक ने सभी को चौंका दिया है। यह बैठक 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने और नई रणनीति बनाने पर केंद्रित रही। पिछले एक साल से लंबित इस पद पर इसी सप्ताह ऐलान होने की संभावना है। आइए, इसकी गहराई में उतरें और समझें कि यह बदलाव यूपी की राजनीति को कैसे प्रभावित करेगा।
योगी-आरएसएस बैठक: मिशन 2027 की शुरुआत
लखनऊ के कालिदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर सोमवार को आयोजित इस बैठक में बीजेपी, आरएसएस और यूपी सरकार के शीर्ष नेता शामिल हुए। मुख्य अतिथियों में आरएसएस के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार और बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष प्रमुख थे। योगी आदित्यनाथ के अलावा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह भी मौजूद रहे।
बैठक का मुख्य एजेंडा यूपी बीजेपी अध्यक्ष पद पर सहमति बनाना था। सूत्रों के अनुसार, बीएल संतोष ने दिल्ली से प्राप्त संभावित नामों को साझा किया। यह बैठक न केवल अध्यक्ष चयन पर फोकस करती है, बल्कि पंचायत चुनावों और 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर देती है। आरएसएस की भूमिका यहां महत्वपूर्ण रही, क्योंकि संघ हमेशा से बीजेपी की वैचारिक आधारशिला रहा है। योगी सरकार और संघ के इस गठबंधन से साफ संकेत मिलता है कि पार्टी आगामी चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार हो रही है।
संभावित उम्मीदवार: जातिगत समीकरणों का खेल
यूपी बीजेपी अध्यक्ष पद की दौड़ में छह प्रमुख नाम चर्चा में हैं। इनमें ब्राह्मण, ओबीसी और दलित समुदाय के नेता शामिल हैं, जो यूपी की जटिल जातिगत राजनीति को ध्यान में रखते हुए चुने गए हैं। प्रमुख दावेदारों में पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा (ब्राह्मण), विधायक हरीश द्विवेदी (ब्राह्मण), बीएल वर्मा (ओबीसी), धर्मपाल सिंह (ओबीसी), लक्ष्मीकांत वाजपेयी (दलित) और अन्य शामिल हैं।
दिल्ली में हुई केंद्रीय बैठक में नौ संभावित नामों पर चर्चा हुई, जिनमें से तीन-तीन प्रत्येक वर्ग से थे।
अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व लेगा, लेकिन लखनऊ बैठक में स्थानीय सहमति बनाने पर जोर दिया गया
। विशेषज्ञों का मानना है कि नया अध्यक्ष ऐसा होगा जो योगी सरकार के विकास एजेंडे को मजबूती दे सके
और विपक्षी दलों के खिलाफ मजबूत मोर्चा खोल सके।
यह चयन 2024 लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी की कमजोरियों को दूर करने का प्रयास है
, जहां बीजेपी को बहुमत के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा।
2027 चुनाव रणनीति: संगठन से सत्ता तक मजबूत तालमेल
यह बैठक मिशन 2027 का आगाज मानी जा रही है। आरएसएस और बीजेपी के बीच समन्वय से संगठन
स्तर पर बड़े बदलाव की उम्मीद है
। फोकस बूथ मजबूती, कार्यकर्ता प्रशिक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच बढ़ाने पर रहेगा।
योगी सरकार की योजनाओं जैसे ‘एक जिला एक उत्पाद’ और बुनियादी ढांचे के विकास को चुनावी मुद्दा
बनाने की रणनीति बनेगी।
विपक्षी दलों, खासकर सपा-कांग्रेस गठबंधन को चुनौती देने के लिए हिंदुत्व और विकास का मिश्रण अपनाया जाएगा।
