नई दिल्ली, 25 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ईसाई आर्मी ऑफिसर सैमुअल कमलेसन की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है। ईसाई आर्मी ऑफिसर मंदिर विवाद सुप्रीम कोर्ट फैसला में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की बेंच ने कहा कि सेना में अनुशासन सर्वोपरि है, और धार्मिक आजादी के नाम पर परंपराओं का उल्लंघन नहीं हो सकता। यह CJI सूर्यकांत का पहला बड़ा फैसला है, जो धार्मिक अहंकार और सेना की धर्मनिरपेक्षता पर केंद्रित है। कमलेसन ने मंदिर में प्रवेश से इनकार किया था, जिसे कोर्ट ने जवानों की भावनाओं का अपमान माना।
केस का बैकग्राउंड: धार्मिक परेड में टकराव
ईसाई आर्मी ऑफिसर मंदिर विवाद सुप्रीम कोर्ट फैसला की जड़ें मार्च 2017 में हैं, जब सैमुअल कमलेसन को तीसरी कैवलरी रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला। यह रेजिमेंट सिख, जाट और राजपूत सैनिकों वाली थी, जिसमें स्क्वाड्रन बी के ट्रूप लीडर के रूप में उन्हें सिख जवान सौंपे गए।
रेजिमेंट में धार्मिक परेड के लिए केवल एक मंदिर और एक गुरुद्वारा था, कोई सर्व धर्म स्थल नहीं। कमलेसन, जो ईसाई हैं, हर हफ्ते होने वाली धार्मिक परेड में हिस्सा लेते थे, लेकिन पूजा, हवन या आरती के दौरान मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश से इनकार करते थे। उनका तर्क था कि वे एकेश्वरवादी ईसाई हैं, और मंदिर के अंदर जाना उनके धर्म के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सिर्फ एक बार गर्भगृह में घुसने से मना किया था, और सर्व धर्म स्थल पर जाते रहे। लेकिन रेजिमेंट ने इसे अनुशासनहीनता माना, और 2019 में उन्हें बर्खास्त कर दिया।
कोर्ट प्रोसीडिंग्स: आर्टिकल 25 बनाम सेना अनुशासन
कमलेसन ने दिल्ली हाईकोर्ट में बर्खास्तगी को चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। याचिकाकर्ता के वकील सीनियर एडवोकेट गोपाल संकरनारायणन ने दलील दी कि मंदिर में जबरन प्रवेश धार्मिक आजादी (संविधान के आर्टिकल 25) का उल्लंघन है।
उन्होंने कहा, “कमलेसन झगड़ालू नहीं हैं, वे अन्य मामलों में अनुशासित रहे। एक पादरी ने भी कहा कि पवित्र स्थल पर जाना ईसाई धर्म का उल्लंघन नहीं।” लेकिन CJI सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी की:
आप अपने जवानों की भावनाओं का सम्मान करने में नाकाम रहे। धार्मिक अहंकार इतना ज्यादा है कि आपको दूसरों की कोई परवाह नहीं।”
उन्होंने गुरुद्वारे का जिक्र किया, जो सेक्युलर स्थान है, और पूछा, “क्या वे अन्य धर्मों का अपमान नहीं कर रहे?”
जस्टिस बागची ने पादरी की टिप्पणी पर सहमति जताई, लेकिन कोर्ट ने कहा कि एक आर्मी ऑफिसर के लिए यह सबसे बड़ी अनुशासनहीनता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बर्खास्तगी जायज
मंगलवार को सुनवाई के बाद ईसाई आर्मी ऑफिसर मंदिर विवाद सुप्रीम कोर्ट फैसला
में बेंच ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया
और कहा कि कमलेसन का आचरण वैध आदेश का उल्लंघन था।
भारतीय सेना धर्मनिरपेक्ष संस्था है,
जहां अनुशासन से समझौता नहीं हो सकता। CJI ने जोर दिया, “वे किस मैसेज दे रहे हैं?
सिर्फ इसी के लिए निकाल देना चाहिए।”
फैसले ने साफ किया कि धार्मिक परंपराओं का पालन अनिवार्य है,
खासकर जब यह यूनिट की एकता से जुड़ा हो।
प्रतिक्रियाएं और प्रभाव: सेना की धर्मनिरपेक्षता मजबूत
फैसले पर सैन्य विशेषज्ञों ने सराहना की, कहा कि यह सेना
की एकता को मजबूत करता है।
एक रिटायर्ड कर्नल ने कहा, “धार्मिक आजादी महत्वपूर्ण है,
लेकिन बैरक में अनुशासन पहले।”
कमलेसन के समर्थक इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं।
CJI सूर्यकांत की टिप्पणियां सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं,
जहां #ReligiousArrogance ट्रेंड कर रहा है।
यह फैसला अन्य धार्मिक विवादों के लिए मिसाल बनेगा।
