बरेली बुलडोजर एक्शन 2025
- 3 दिसंबर 2025 को, Barelly Development Authority (बीडीए) की टीम ने Sarfaraz Wali Khan और Rashid Khan के कथित अवैध बने दो बरात-घरों पर बुलडोजर चलाया।
- कार्रवाई शुरू होते ही, बरात-घर की दूसरी मंजिल पर खड़ी कुछ महिलाएं और लड़कियाँ डर के मारे चीख-चीख कर रोने लगीं।
- वो पुलिस और अधिकारियों से गुहार लगाने लगीं — “रहम करो… रहम… खुदा से डरो… मत तोड़ो मेरा घर” — भावुक और दिल दहला देने वाले नारे उनके दर्द को बयां कर रहे थे।
कार्रवाई की पृष्ठभूमि
- यह बुलडोजर कार्रवाई उस 26 सितंबर 2025 की हिंसा के बाद की गई थी, जिसमें कथित तोड़फोड़, स्टोन पथराव और पुलिस वर्चस्व के संघर्ष की शिकायत दर्ज थी।
- सरकार ने अवैध निर्माणों व उपद्रव से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है, और इसी के तहत बीडीए व पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई की।
टूटे सपने — पीड़ित परिवारों की व्यथा
- घटनास्थल पर बूढ़ी-बच्ची, महिलाएं-लड़कियाँ — सबने तत्काल विरोध जताया। छत पर खड़ी महिलाओं को नीचे लाने में पुलिस को करीब 40 मिनट लग गए।
- एक बुज़ुर्ग महिला ने माथा पीटते हुए “मत तोड़ो मेरा घर” कहते हुए विलाप किया। कई महिलाएं हाथ जोड़कर बचाव की मांग करती दिखीं।
- न सिर्फ मकान, बल्कि घरों में बसे परिवारों की यादें,
- संवेदनाएँ और भविष्य के सपने एक झटके में ध्वस्त हो गए।
प्रशासन का पक्ष और कानूनी आधार
- अधिकारियों ने कहा कि कार्रवाई “ऊपर के आदेश” के तहत की गई
- — वे अवैध निर्माण, उपद्रव और कानून उल्लंघन वाले लोगों पर कार्रवाई में मजबूर थे।
- यह वही खाका है जिसे पिछले कुछ महीनों में कई शहरों में देखा गया
- — अवैध मकानों, शोरूम व बारात-घरों पर बुलडोजर कार्रवाई
सामाजिक–मानवीय सवाल: क्या सिर्फ “निर्माण” था मकसद?
इस घटना ने कई संवेदनशील सवाल खड़े कर दिए हैं:
- एक घर सिर्फ “बनावट” नहीं — वह परिवार का आशियाना, उनकी पहचान व उनकी ज़िंदगी होती है।
- इसे सिर्फ कानूनन एक निर्माण समझकर गिरा देना — क्या यह सही है?
- जब बच्चों, बुज़ुर्गों, महिलाओं की भावनाएं जुड़ी हों, तो कार्रवाई से पहले क्या सामाजिक
- व मानवीय पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए था?
- न्याय और शासन की कार्रवाई होनी चाहिए — लेकिन क्या संवेदनाओं, भावनाओं और मानव गरिमा को भी ध्यान में रखा गया?
बरेली की यह घटना सिर्फ एक “बुलडोजर कार्रवाई” नहीं थी — यह उन आम इंसानों
परिवारों और उनकी ज़िंदगियों के साथ हुआ एक दर्दनाक पल था।
जहां एक तरफ कानून का दबदबा और राज्य का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर इंसानों की भावनाएं
उनका आशियाना, उनकी यादें और उनका भरोसा भी है।
हमारे समाज के लिए यह जरूरी है कि विकास और क़ानून के साथ
साथ मानवीय संवेदनाओं का भी ख्याल रखा जाए।