परिचय: आस्था का नया अध्याय
अयोध्या, भगवान राम की जन्मभूमि, आज फिर से विश्व पटल पर चमक रही है। राम जन्मभूमि पर बने भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है, और अब शिखर पर केसरिया धर्मध्वज फहराने की तैयारियाँ जोरों पर हैं। यह ध्वज न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि सदियों की संघर्षपूर्ण यात्रा का भी प्रमाण। 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं का केंद्र बन गया है। दैनिक हजारों भक्त दर्शन के लिए आते हैं, और दान-पुण्य का सैलाब उमड़ रहा है। लेकिन सवाल उठता है – यह मंदिर आखिर किसका है? और मंदिर में आने वाले अरबों रुपये का क्या होता है? आइए, इस ब्लॉग में हम इसकी गहराई से पड़ताल करते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: विवाद से विजय तक की यात्रा
राम जन्मभूमि विवाद सदियों पुराना है। मुगल काल से चली आ रही इस विवादास्पद भूमि पर बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में हुआ था। 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों द्वारा मस्जिद ढहाए जाने के बाद मामला और उग्र हो गया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें 2.77 एकड़ विवादित भूमि को राम मंदिर निर्माण के लिए सौंप दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह भूमि हिंदू आस्था का अभिन्न अंग है। इसके साथ ही, मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक 5 एकड़ भूमि अयोध्या में ही देने का आदेश दिया गया। इस फैसले ने न केवल कानूनी विवाद समाप्त किया, बल्कि राष्ट्रीय एकता का संदेश भी दिया। मंदिर निर्माण का बीड़ा उठाने के लिए केंद्र सरकार ने फरवरी 2020 में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया। ट्रस्ट में प्रमुख संतों, पूर्व जजों और सरकारी प्रतिनिधियों को शामिल किया गया, जिसके चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र हैं।
राम मंदिर का असली मालिक: रामलला विराजमान
सबसे बड़ा सवाल – राम मंदिर का मालिक कौन है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, मंदिर की कानूनी मालिकाना हक ‘रामलला विराजमान’ के पास है। रामलला, भगवान राम के बाल स्वरूप हैं, और अदालत ने उन्हें एक ‘जुरिडिकल पर्सन’ (कानूनी व्यक्ति) का दर्जा दिया। इसका मतलब है कि मंदिर की संपत्ति सीधे भगवान राम के नाम पर है, न कि किसी व्यक्ति या संगठन के। यह फैसला पुरातात्विक साक्ष्यों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और गवाहों की गहन जांच पर आधारित था। ट्रस्ट केवल प्रबंधक की भूमिका निभाता है – निर्माण, रखरखाव और दैनिक संचालन का। ट्रस्ट के 15 सदस्यों में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के प्रतिनिधि भी शामिल हैं, जो लंबे समय से इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। इस व्यवस्था से मंदिर की पवित्रता बरकरार रहती है, और कोई व्यक्तिगत स्वार्थ हावी नहीं होता।
दान का प्रबंधन: पारदर्शिता और हिसाब-किताब
मंदिर में दान का सैलाब देखने लायक है। आम भक्त से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ तक, हर कोई योगदान दे रहा है। मार्च 2023 तक ट्रस्ट के बैंक खातों में 3,000 करोड़ रुपये से अधिक जमा हो चुके थे। इसमें नकद, सोना-चांदी और अन्य वस्तुएँ शामिल हैं। लेकिन सवाल है – यह पैसा कहाँ जाता है? सभी दान सीधे ट्रस्ट के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) खातों में जमा होते हैं। दान काउंटर पर रसीदें जारी की जाती हैं, और हर लेनदेन का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाता है। निकासी की प्रक्रिया अत्यंत सतर्कता से होती है – ट्रस्ट सदस्यों और SBI अधिकारियों की संयुक्त टीम निगरानी करती है।
खर्च का ब्रेकडाउन स्पष्ट है: लगभग 1,000 करोड़ रुपये मंदिर निर्माण पर व्यय हो चुके हैं।
बाकी राशि मंदिर के रखरखाव, सुरक्षा व्यवस्था, भविष्य के विस्तार (जैसे परिक्रमा पथ), धार्मिक उत्सवों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर लग रही है।
ट्रस्ट नियमित ऑडिट करवाता है, और वित्तीय रिपोर्ट्स सार्वजनिक की जाती हैं। इससे पारदर्शिता बनी रहती है,
और दानदाताओं का विश्वास बढ़ता है। उदाहरण के लिए, हाल ही में आईटी जायंट्स ने करोड़ों का योगदान दिया
, जो सीधे ट्रस्ट के माध्यम से उपयोग हो रहा है।
ध्वजारोहण: आस्था का नया प्रतीक
अब आते हैं ध्वजारोहण पर। मंदिर के शिखर पर केसरिया धर्मध्वज फहराना एक बहुप्रतीक्षित क्षण होगा।
यह ध्वज आस्था, शौर्य और गौरव का प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, ध्वज रोज बदला जाता है,
और इसे विशेष पूजा-अर्चना के बाद स्थापित किया जाता है।
केसरिया रंग भगवा परंपरा को दर्शाता है, जो राम भक्ति से जुड़ा है।
इस समारोह में संतों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ेगी, और यह लाइव प्रसारित होगा।
ध्वज फहराने से मंदिर की भव्यता और बढ़ जाएगी, जो दूर से ही दिखाई देगी।