स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय प्रतीक की कहानी किसी पुराण कथा से कम नहीं है। यह कहानी है उस भव्य अशोक स्तंभ की, जो मिट्टी की परतों से निकला और नेहरू-पटेल की दूरदर्शिता से देश की शान बना। आज यह चार शेरों वाला शीर्ष (लायन कैपिटल) भारत के हर सरकारी दस्तावेज, पासपोर्ट, नोट और संसद भवन पर गर्व से चमकता है। आइए जानते हैं इसकी रोचक यात्रा – खोज से लेकर नामकरण तक।
मिट्टी में दबा था ‘अशोक स्तंभ’ – रहस्यमयी खोज
19वीं शताब्दी के अंत में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के पास कौशांबी में पुरातात्विक खुदाई हुई। 1905 में ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने मिट्टी से 50 फुट ऊंचा संगमरमर का स्तंभ बाहर निकाला। यह सम्राट अशोक का स्तंभ था, जिस पर शिलालेख खुदे थे। शीर्ष भाग (चार शेरों वाला कैपिटल) अलग था और बाद में वाराणसी के सारनाथ से मिला। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने इसे अहिंसा, बौद्ध धर्म और शांति से जोड़ा। नेहरू ने इसे ‘धर्मचक्र’ के रूप में देखा, जो अशोक के शिलालेखों से प्रेरित था।
नेहरू-पटेल ने क्यों चुना अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक?
1947 में आजादी के बाद संविधान सभा में राष्ट्रीय प्रतीक चुनना बड़ा मुद्दा था। नेहरू और सरदार पटेल ने अशोक स्तंभ को चुना क्योंकि यह अखंड भारत का प्रतीक था। अशोक मौर्य साम्राज्य ने पूरे उपमहाद्वीप को एकजुट किया था, जो नवभारत के लिए आदर्श था। पटेल ने कहा, “यह स्तंभ अहिंसा, शांति और एकता का प्रतीक है।” नेहरू ने इसे धर्मनिरपेक्ष भारत से जोड़ा, क्योंकि अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाकर सभी संप्रदायों को समान सम्मान दिया। अन्य विकल्प जैसे सूर्य, कमल या चक्र को खारिज किया गया, क्योंकि अशोक स्तंभ ऐतिहासिक और पुरातात्विक रूप से प्रमाणित था।
चार शेरों वाला शीर्ष: कैसे बना देश का आधिकारिक चिह्न?
अशोक स्तंभ का शीर्ष भाग सारनाथ से मिला, जहां अशोक ने बौद्ध संघ की स्थापना की थी। इसमें चार शेर पीठ सटाकर खड़े हैं, जो चार दिशाओं में शक्ति और सतर्कता का प्रतीक हैं। 26 नवंबर 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय प्रतीक घोषित किया। डिजाइन में शेरों को और भव्य बनाया गया। नीचे अश्वमेध, बैल, हाथी और घोड़े जोड़े गए। कानून मंत्री डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसे मंजूरी दी। आज यह प्रतीक सभी सरकारी दस्तावेजों, मुहरों और पासपोर्ट पर अनिवार्य है।
नोटों पर धर्मचक्र: अशोक स्तंभ का आर्थिक सफर
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 1949 में नेहरू के सुझाव पर नोटों पर अशोक स्तंभ का धर्मचक्र छापना शुरू किया।
24 तीलियों वाला यह चक्र अशोक के कानूनों और न्याय का प्रतीक है।
पहले नोटों पर राजा राममोहन राय या अन्य चित्र थे,
लेकिन 1950 से महात्मा गांधी के साथ यह चक्र प्रमुख हो गया। पटेल ने कहा,
“यह ब्रिटिश राज के प्रतीकों से मुक्ति का संदेश देता है।”
आज 10 रुपये से 2000 रुपये तक के नोटों पर यही चक्र भारत की आर्थिक शान बढ़ाता है।
नामकरण की अनोखी प्रक्रिया: लायन कैपिटल से राष्ट्रीय चिह्न तक
संविधान सभा में शुरू में इसे ‘अशोक लायन कैपिटल’ कहा गया। नेहरू ने इसे सरल और प्रभावी नाम
‘राष्ट्रीय प्रतीक’ देने का फैसला किया। 26 नवंबर 1949 को अंतिम रूप दिया गया।
डिजाइन में शेरों को ऊंचा और मजबूत दिखाया गया ताकि
शक्ति का संदेश स्पष्ट हो। यह प्रतीक रेलवे, डाक टिकट, एयरपोर्ट, मुहरों और सरकारी भवनों पर दिखता है।
UNESCO ने सारनाथ के अशोक स्तंभ को विश्व धरोहर घोषित किया, जो भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करता है।