इस समाचार में बिहार की राजनीति और सीट बंटवारे को लेकर लोजपा (रामविलास) और भाजपा के बीच चल रही तनातनी पर प्रकाश डाला गया है। खबर के अनुसार, भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद चिराग पासवान पहले के मुकाबले नरम पड़े हैं, लेकिन अभी तक सीटों पर अंतिम समझौता नहीं हो पाया है।
चिराग पासवान की ओर से यह उम्मीद की जा रही है कि भाजपा उन्हें सम्मानजनक हिस्सेदारी दे, जबकि भाजपा अपनी गठबंधन नीति और सीट वितरण प्रणाली पर अडिग है।प्रमुख बिंदुचिराग पासवान ने शुरुआती दौर में अपनी सख्त मांगों के जरिए गठबंधन में दबाव बना दिया था, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद उनके तेवर नरम हो गए हैं।
चिराग पासवान चाहते हैं कि लोजपा (रामविलास) को लोकसभा चुनाव में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले।सीटों की संख्या और नाम पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है, दोनों दलों में बातचीत जारी है।प्रधानमंत्री और अन्य शीर्ष भाजपा नेताओं से भी चिराग पासवान सीधा संपर्क नहीं कर पा रहे थे, जिससे गतिरोध और बड़ा।लोजपा (रामविलास) द्वारा 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए से अलग राह अपनाने और कई सीटों पर भाजपा के नुकसान की पृष्ठभूमि में भाजपा सतर्क है।
दोनों दलों के लिए सीटों का बंटवारा काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में जातिगत समीकरण और पिछली गलतफहमियों का असर भी रहेगा।नई खबर (परिवर्तित और विस्तार से)शीर्षक:”बिहार में एनडीए गठबंधन पर खींचतान: चिराग पासवान की अहमियत और भाजपा की रणनीति के बीच सीट बंटवारे पर संशय”प्रमुख खबरबिहार की राजनीति में एक बार फिर सीट बंटवारे को लेकर घमासान मचा है।
लोजपा (रामविलास) के नेता चिराग पासवान और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच चल रही अनबन अब खुलकर सामने आ गई है। चिराग पासवान की मांग है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले, जबकि भाजपा अपने रणनीतिक फॉर्मूले से पीछे हटती नहीं दिख रही।विस्तृत विश्लेषणबिहार में एनडीए के घटक दलों के बीच सीटों के आंकड़े को लेकर खींचतान लगातार बढ़ती जा रही है।
लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने पिछले चुनावों में एनडीए प्रत्याशियों के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया था। इस बार भी वह कई सीटों पर दावेदारी कर रहे हैं, जिससे गठबंधन के समीकरण उलझ गए हैं।भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद चिराग की स्थिति में नरमी तो आई है,
पर सीटों पर बात अभी भी नहीं बन सकी है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि चिराग पासवान को भाजपा की जरूरत तो है, लेकिन भाजपा अपने हितों के साथ समझौता नहीं कर सकती। बिहार में टिकट बंटवारे से ही राज्य की करीब-करीब सभी बड़ी पार्टियों की राजनीति तय होने वाली है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पटना के भाजपा कार्यालय से भी चिराग पासवान को सीधा संवाद नहीं मिला, जिससे बात और जटिल होती गई।
2020 के विधानसभा चुनाव में लोजपा के अलग होने के कारण भाजपा-नीतीश गठबंधन कई सीटों पर हारा था, इसी कारण भाजपा अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू एवं आने वाली सीटों के संयोजन के चलते तीनों दलों के बीच तालमेल बड़ा विषय बना हुआ है।एनडीए के रणनीतिकार मानते हैं कि अगर चिराग पासवान को पर्याप्त सीटें नहीं मिलती हैं, तो वे स्वतंत्र चुनाव लड़ सकते हैं,
जो कि एनडीए के लिए बड़ा नुकसान होगा। इसीलिए चिराग को सम्मानजनक सीट देने की कोशिश हो रही है, लेकिन इससे भाजपा के परंपरागत उम्मीदवारों में नाराजगी बढ़ने की संभावना है। नीतीश कुमार की पार्टी इस बार कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है।बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरण बेहद जटिल हैं।
इसमें पासवान वोट बैंक, भाजपा का सांप्रदायिक एवं सवर्ण वोट बैंक, वहीं जदयू के कुशवाहा-यादव जैसे जातीय समीकरण बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन्हीं समीकरणों के चलते सीट बंटवारा खासी चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया बन गई है।भाजपा के कार्यकर्ता और सीट मांगने वाले उम्मीदवारों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, चिराग पासवान सीटों की ‘मिनिमम गारंटी’ के साथ एनडीए में बने रहना चाहते हैं।
वहीं भाजपा चाहती है कि सीटों का बंटवारा पूरे राज्य के जनसांख्यिकीय और राजनीतिक समीकरण के आधार पर हो।एलजेपी के पिछले प्रदर्शन और चिराग की युवा राजनीति को ध्यान में रखते हुए एनडीए में उनका रहना भाजपा के लिए भी फायदेमंद है। लेकिन सीटों पर सहमति बनाने के लिए दोनों पक्षों को काफी चर्चा करनी पड़ रही है।सम्बन्धित खबर यह भी बताती है कि दोनों दलों के बीच सहमति बनाना 2020 के मुकाबले कठिन है।
इसके पीछे अहम वजह 2020 में एलजेपी का अलग चुनाव लड़ना और भाजपा के उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाना है। यही वजह है कि भाजपा अब अपनी हर बात पर स्पष्टता चाहती है। चिराग पासवान ने इसके बावजूद जोर देकर कहा कि वे गठबंधन धर्म का पालन करेंगे, पर सम्मानजनक हिस्सेदारी के बिना यह संभव नहीं है।
गौरतलब है कि बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से सबसे अधिक सीटें भाजपा और जदयू के पाले में जाती रही हैं। लेकिन 2024 के चुनाव से पहले जो राजनीतिक खींचतान शुरू हुई है, उसमें लोजपा (रामविलास) की भूमिका निर्णायक बन सकती है।निष्कर्षबिहार की राजनीति में सीट बंटवारे का मुद्दा फिलहाल अनसुलझा है। भाजपा और लोजपा (रामविलास) दोनों ही अपने-अपने हित में सौदेबाजी कर रहे हैं।
हाईकमान के हस्तक्षेप के बावजूद, अंतिम सहमति तक पहुंचना कठिन नजर आ रहा है। एनडीए के लिए यह परीक्षा की घड़ी है, जिसमें सीट बंटवारे के साथ-साथ दलों के आंतरिक समीकरण, सामाजिक समीकरण और नेतृत्व का संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती है।