अमेरिका-भारत ट्रेड डील की प्रासंगिकता
अमेरिका और भारत के बीच हाल ही में हुई ट्रेड डील फरवरी 2026 में अमेरिकी टैरिफ को 25% से घटाकर 18% करने पर केंद्रित थी, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ आदेशों को रद्द कर दिया है। इस बदलाव ने डील की मौजूदा प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि मूल रूप से यह रूस से तेल खरीद के कारण लगे दंडात्मक शुल्कों को हटाने पर आधारित थी। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि डील में कोई बदलाव नहीं होगा और यह अब भी वैध बनी रहेगी।
यह ट्रेड डील दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण कदम थी, जो वैश्विक व्यापार की चुनौतियों के बीच उभरी। भारत के लिए यह निर्यात बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है, जबकि अमेरिका को ऊर्जा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में लाभ मिलता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसकी नींव हिला दी है, जिससे विशेषज्ञों में बहस छिड़ गई है। क्या यह डील अब बेकार हो गई? या फिर नई परिस्थितियों में भी प्रासंगिक बनी रहेगी? आइए विस्तार से समझते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का प्रभाव
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 22 फरवरी 2026 को ट्रंप के व्यापक टैरिफ नीतियों को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया, जिससे भारत सहित कई देशों पर लगे शुल्क प्रभावित हुए। इससे पहले फरवरी 2026 के संयुक्त बयान में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर कुल प्रभावी शुल्क 50% से घटाकर 18% किया था, जिसमें अतिरिक्त 25% दंड हटा था। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट फैसले से डील की मूल संरचना कमजोर हुई है, लेकिन दोनों देशों के बीच चल रही कानूनी प्रक्रिया मार्च तक इसे पुनः परिभाषित कर सकती है।
यह फैसला ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पर बड़ा झटका है, जो वैश्विक व्यापार युद्धों का हिस्सा था। भारत पर लगे दंडात्मक टैरिफ मुख्य रूप से रूस से तेल आयात के कारण थे, जो यूक्रेन संकट से जुड़े प्रतिबंधों का परिणाम थे। कोर्ट ने इन टैरिफ को कार्यकारी शक्ति का दुरुपयोग माना। नतीजतन, भारत के निर्यातकों को राहत मिली है, लेकिन ट्रेड डील की शर्तें अब अस्पष्ट हो गई हैं। यदि कानूनी प्रक्रिया सफल रही, तो डील को नए टैरिफ फ्रेमवर्क के तहत समायोजित किया जा सकता है, जो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो।
ट्रेड डील की प्रमुख विशेषताएं
यह अंतरिम समझौता भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने के लिए डिजाइन किया गया था, जिसमें अमेरिका द्वारा ऊर्जा, कोयला, प्रौद्योगिकी और कृषि उत्पादों की खरीद को 500 अरब डॉलर तक बढ़ाने का प्रावधान था। भारत ने बदले में ‘बाय अमेरिकन’ नीति को सरकारी खरीद में मजबूत करने का वादा किया। जीरो टैरिफ वाले दावों पर व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि यह चुनिंदा उत्पादों पर लागू होगा, न कि पूर्ण रूप से।
डील की अन्य विशेषताओं में कृषि और डेयरी क्षेत्र में सहयोग शामिल है, जहां भारत ने
अपनी बाजार पहुंच को सीमित रखा था। अमेरिका ने प्रौद्योगिकी ट्रांसफर और
कोयला निर्यात को प्राथमिकता दी, जो भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है। कुल मिलाकर,
यह डील दोनों अर्थव्यवस्थाओं को संतुलित करने का प्रयास थी, जिसमें टैरिफ कमी के अलावा निवेश और
व्यापार संतुलन पर फोकस था। विशेषज्ञों के अनुसार, 500 अरब डॉलर का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है,
लेकिन सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद इसे हासिल करने के रास्ते में बाधाएं बढ़ गई हैं।
वर्तमान स्थिति और भविष्य
ट्रंप ने कहा है कि डील अब “फेयर” है, जिसमें भारत टैरिफ देगा लेकिन अमेरिका नहीं, जो
सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद भी बरकरार रहेगी। 2025 में बातचीत अटकी थी क्योंकि भारत कृषि-डेयरी पर अड़ गया था,
लेकिन 2026 में प्रगति हुई। आने वाले दिनों में दर्पण जैन की अमेरिका
यात्रा से कानूनी मसौदा फाइनल हो सकता है, जिससे डील बेकार साबित होने की आशंका कम हो।
कुल मिलाकर, डील का मतलब खत्म नहीं हुआ है बल्कि नया रूप ले रहा है।
भविष्य में, यदि मार्च तक की कानूनी प्रक्रिया पूरी हो गई, तो डील को नए टैरिफ
नियमों के अनुरूप बनाया जा सकता है। ट्रंप की टिप्पणियां संकेत देती हैं कि अमेरिका अभी भी प्रतिबद्ध है,
लेकिन भारत को अपनी कृषि नीतियों में लचीलापन दिखाना पड़ सकता है।
वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच यह डील दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है,
जो न केवल व्यापार बढ़ाएगी बल्कि रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगी।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि डील की प्रासंगिकता बनी रहेगी, लेकिन इसका रूप बदल सकता है।