इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2026 में मदरसों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया, जिसे जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद असद मदनी ने “संविधान की जीत” बताया। यह फैसला उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड की स्वायत्तता, पाठ्यक्रम और राज्य हस्तक्षेप पर केंद्रित है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 26 और 30 का हवाला देकर अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों की पुष्टि की, लेकिन आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा के संतुलन पर जोर दिया। इस फैसले से मदरसा शिक्षा में सुधार की नई दिशा मिली है, जो मुस्लिम समुदाय के लिए आशा की किरण है। उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में मदरसों की स्थिति अब और मजबूत हो सकती है, बशर्ते सरकारें संवैधानिक ढांचे में सुधार करें।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: मुख्य बिंदु और पृष्ठभूमि
*इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड एक्ट 2004 की वैधता पर सुनवाई करते हुए फैसला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मदरसों को धार्मिक शिक्षा देने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप होना चाहिए। अनुच्छेद 26 धार्मिक मामलों में स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी संस्थाएं चलाने का हक प्रदान करता है। हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार मदरसों को वित्तीय सहायता दे सकती है, लेकिन पाठ्यक्रम में विज्ञान, गणित, अंग्रेजी और कंप्यूटर जैसे विषयों को अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।
यह फैसला लंबे समय से चली आ रही बहस का नतीजा है। 2024 में हाईकोर्ट ने मदरसा एक्ट को असंवैधानिक करार दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दे दिया। 2026 का यह जजमेंट उस स्टे के बाद की सुनवाई का परिणाम है, जिसमें मदरसा बोर्ड की भूमिका को फिर से परिभाषित किया गया। अदालत ने मदरसों को “धार्मिक और आधुनिक शिक्षा का पुल” बताया और राज्य हस्तक्षेप को सीमित करने पर जोर दिया। इससे मदरसों की मान्यता रद्द होने का खतरा टल गया है, और अब वे NCERT पाठ्यक्रम के साथ धार्मिक शिक्षा जारी रख सकते हैं।
मौलाना महमूद असद मदनी का बयान: संविधान की जीत क्यों?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद असद मदनी ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे “संविधान की जीत” करार दिया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करता है और मदरसा शिक्षा को मजबूत बनाता है। मदनी साहब ने उत्तर प्रदेश सरकार समेत सभी राज्य सरकारों से अपील की कि वे मदरसों को संवैधानिक ढांचे में और मजबूत करें। उनका मानना है कि यह फैसला राजनीतिक विवादों को खत्म करेगा और मुस्लिम युवाओं को आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक मूल्यों से जोड़ेगा।
मौलाना मदनी ने जोर दिया कि मदरसे केवल धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि समाज के विकास के साधन हैं। उन्होंने कहा, “यह फैसला धर्मनिरपेक्षता की जीत है, जो मदरसों को राज्य सहायता लेने की अनुमति देता है बिना उनकी स्वायत्तता छीने।” जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस फैसले को लागू करने के लिए एक समिति गठित करने की भी मांग की है, ताकि मदरसों में सुधार सुगम हो।
फैसले के प्रभाव: मदरसा शिक्षा में सुधार और चुनौतियां
यह फैसला उत्तर प्रदेश के करीब 16,000 मदरसों को सीधे प्रभावित करेगा, जहां लाखों छात्र पढ़ते हैं।
अब मदरसा बोर्ड को पाठ्यक्रम में बदलाव करने होंगे, जिसमें आधुनिक विषयों को शामिल करना अनिवार्य होगा
। इससे मदरसा छात्रों की मुख्यधारा में भागीदारी बढ़ेगी और रोजगार के अवसर मिलेंगे।
हालांकि, कुछ चुनौतियां भी हैं, जैसे फंडिंग की कमी और शिक्षकों की ट्रेनिंग।
राज्य सरकार को मदरसों के लिए अलग बजट आवंटित करना होगा।
मुस्लिम संगठनों ने फैसले का समर्थन किया है, लेकिन कुछ ने राज्य हस्तक्षेप की आशंका जताई। कुल मिलाकर,
यह जजमेंट संतुलित है और मदरसा शिक्षा को 21वीं सदी के अनुरूप बनाएगा।
मौलाना मदनी की अपील से सरकारें अब सक्रिय हो सकती हैं।
मदरसा शिक्षा का नया दौर
इलाहाबाद हाईकोर्ट का 2026 का फैसला मदरसा शिक्षा के इतिहास में मील का पत्थर है। यह संविधान की जीत है,
जो अल्पसंख्यक अधिकारों को मजबूत करता है। सभी स्टेकहोल्डर्स को मिलकर मदरसों को मजबूत बनाना चाहिए,
ताकि मुस्लिम समुदाय का विकास हो। यदि सुधार सही दिशा में हुए, तो मदरसे भारत की विविधता का प्रतीक बनेंगे।