भारत के पहले प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। उनकी दूरदर्शिता का एक बड़ा उदाहरण भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम है। नेहरू ने परमाणु ऊर्जा को शांतिपूर्ण विकास के लिए महत्वपूर्ण माना और इसकी मजबूत नींव रखी। 1948 में ही उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की और डॉ. होमी भाभा को इसका नेतृत्व सौंपा। नेहरू का मानना था कि परमाणु ऊर्जा भारत को ऊर्जा स्वावलंबन और वैज्ञानिक प्रगति देगी। उनकी नीतियों से ट्रॉम्बे में पहला रिएक्टर ‘अप्सरा’ 1956 में शुरू हुआ। नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु निरस्त्रीकरण की वकालत की, लेकिन साथ ही भारत के लिए परमाणु क्षमता जरूरी मानी। उनकी यह विरासत आज भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाती है।
नेहरू की दूरदर्शिता: परमाणु ऊर्जा की शुरुआत
नेहरू ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद परमाणु ऊर्जा पर फोकस किया। मुख्य कदम:
- 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग स्थापना।
- डॉ. होमी भाभा को अध्यक्ष बनाया।
- शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर।
- ऊर्जा और विज्ञान विकास का माध्यम।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग।
*नेहरू ने कहा, “परमाणु ऊर्जा भविष्य की कुंजी है।”
भाभा के साथ सहयोग: मजबूत नींव
नेहरू और भाभा का सहयोग ऐतिहासिक:
- भाभा की वैज्ञानिक दृष्टि।
- नेहरू का राजनीतिक समर्थन।
- ट्रॉम्बे एटॉमिक रिसर्च सेंटर।
- पहला रिएक्टर अप्सरा।
- कनाडा और अमेरिका से सहयोग।
यह सहयोग भारत को परमाणु क्षेत्र में आगे ले गया।
शुरुआती कदम: अप्सरा और सिरस
नेहरू काल में प्रमुख उपलब्धियां:
- 1956 में अप्सरा रिएक्टर।
- 1960 में सिरस रिएक्टर।
- परमाणु ऊर्जा विभाग स्थापना।
- वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन।
- शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट की तैयारी।
यह नींव 1974 के पोखरण टेस्ट तक पहुंची।
नेहरू की नीति: शांतिपूर्ण उपयोग
*नेहरू की परमाणु नीति:
- शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन।
- निरस्त्रीकरण की वकालत।
- भारत की सुरक्षा।
- वैज्ञानिक अनुसंधान।
- आत्मनिर्भरता।
नेहरू ने कहा, “परमाणु ऊर्जा मानव कल्याण के लिए हो।”
विरासत: आज का परमाणु भारत
नेहरू की नींव से:
- 22 परमाणु रिएक्टर।
- ऊर्जा उत्पादन।
- परमाणु हथियार क्षमता।
- अंतरिक्ष और चिकित्सा में उपयोग।
- विश्व शक्ति के रूप में भारत।
नेहरू की दूरदर्शिता आज फल दे रही है।