एम्स गोरखपुर में सक्रिय बिचौलिए: मरीजों को बहला-फुसलाकर निजी सेंटर पर भेजने का खेल जा

सरकारी अस्पताल में निजी लूट का खेल, बिचौलिए बने मरीजों के दुश्मन

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मरीजों की सेवा के बदले शोषण की सनसनीखेज कहानियां सामने आ रही हैं। यहां सक्रिय बिचौलिए गरीब और असहाय मरीजों को बहला-फुसलाकर सरकारी इलाज से दूर निजी सेंटरों पर भेज रहे हैं। कमीशन के लालच में ये दलाल डॉक्टरों के नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं, जिससे मरीजों को हजारों-लाखों रुपये का चूना लग रहा है। 2025 में दर्जनों शिकायतें मिल चुकी हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं। यह खेल न केवल एम्स की साख को धूमिल कर रहा है, बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य अधिकारों का भी हनन है। आइए, इस काले कारोबार की परतें खोलते हैं।

एम्स गोरखपुर, जो 2019 में शुरू हुआ, पूर्वांचल के लाखों मरीजों की उम्मीद था। लेकिन बिचौलियों की घुसपैठ ने इसे व्यापार का अड्डा बना दिया। मरीजों का कहना है कि ओपीडी में घुसते ही दलाल चिपक जाते हैं – “सर, ये टेस्ट यहां नहीं, बाहर के लैब में करवाओ, तुरंत रिपोर्ट मिलेगी।”

बिचौलियों का modus operandi: बहलावा और फर्जीवाड़ा

बिचौलिए एम्स के गेट, ओपीडी काउंटर और पार्किंग एरिया में सक्रिय रहते हैं। वे खुद को “सीनियर स्टाफ” या “डॉक्टर के असिस्टेंट” बताते हैं। एक मरीज, रामनाथ (बस्ती जिले से), ने बताया, “मेरी पत्नी को कैंसर का शक था। बिचौलिए ने कहा कि एम्स में बेड नहीं, लेकिन पास के निजी हॉस्पिटल में तुरंत भर्ती हो जाओ। 50,000 रुपये का पैकेज बताया, लेकिन बाद में बिल 2 लाख का आया।”

ये दलाल फर्जी प्रिस्क्रिप्शन दिखाते हैं, जहां एम्स के डॉक्टरों के नाम पर निजी सेंटरों के टेस्ट लिखे होते हैं। कमीशन 20-30% तक होता है – एक एमआरआई के लिए 5,000 रुपये का किकबैक। कई मामलों में, मरीजों को अनावश्यक टेस्ट करवाए जाते हैं, जैसे सामान्य सिरदर्द पर CT स्कैन। गोरखपुर के स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, ये बिचौलिए स्थानीय नर्सिंग होम्स और डायग्नोस्टिक सेंटर्स के साथ मिले हुए हैं। 2025 के पहले 10 महीनों में, जिला प्रशासन को 40+ शिकायतें मिलीं, लेकिन ज्यादातर दबा दी गईं।

प्रभावित मरीजों की आपबीती: आंसू और बर्बादी

पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीज सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। एक विधवा, सुनीता (कुशीनगर से), ने कहा, “बेटे की सर्जरी के लिए आई थी। बिचौलिए ने 10,000 रुपये लेकर निजी सेंटर भेजा, जहां बिना जरूरी टेस्ट के 1.5 लाख वसूले। एम्स में फ्री इलाज मिल जाता।” ऐसे मामले किडनी, हृदय रोग और कैंसर विभागों में ज्यादा हैं।

एनसीआरबी डेटा के मुताबिक, यूपी में मेडिकल फ्रॉड के केस 2024 में 25% बढ़े, जिनमें 15% सरकारी अस्पतालों से जुड़े। एम्स गोरखपुर में ही 2025 में 15 मरीजों ने हेल्पलाइन 108 पर शिकायत की। एक सर्वे (लोकल NGO द्वारा) बताता है कि 60% मरीज बिचौलियों के चंगुल में फंसते हैं, जिससे उनका इलाज अधर में लटक जाता है। गरीबी में जीने वाले परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं, कई तो इलाज अधूरा छोड़ भागते हैं।

स्वास्थ्य विभाग की नाकामी: शिकायतें दबाना, कार्रवाई न करना

एम्स प्रशासन का दावा है कि सिक्योरिटी सख्त है, लेकिन हकीकत अलग। कोई आधिकारिक जांच नहीं चली।

यूपी स्वास्थ्य विभाग ने 2024 में “एंटी-टटू” कैंपेन चलाया था

, लेकिन गोरखपुर में यह कागजी रहा। विशेषज्ञों का कहना है

कि डॉक्टरों पर भी दबाव है

– कुछ मामलों में कमीशन शेयरिंग की अफवाहें।

केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के बावजूद,

बिचौलिए इसे बायपास कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में ऐसे मामलों में सख्ती बरतने का आदेश दिया था,

लेकिन जमीनी स्तर पर अमल नहीं। गोरखपुर डीएम ने कहा, “जांच जारी है,” लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं।

बचाव के उपाय: मरीज कैसे बचें बिचौलियों के जाल से?

इस घोटाले से सबक लेते हुए, यहां कुछ टिप्स:

  • ओपीडी में सीधे जाएं: बिचौलियों से बात न करें, सरकारी काउंटर पर ही रजिस्ट्रेशन कराएं।
  • प्रिस्क्रिप्शन चेक: एम्स के बाहर टेस्ट न करवाएं, अस्पताल की लैब यूज करें।
  • शिकायत दर्ज: हेल्पलाइन 104 या 108 पर कॉल करें, या एम्स ग्रिवांस सेल में लिखित तहरीर दें।
  • डिजिटल हेल्प: आयुष्मान कार्ड अपडेट रखें, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट बुक करें।
  • जागरूकता: परिवार के साथ चर्चा करें, फर्जी ID वालों से सावधान।
  • कानूनी सहायता: फ्रॉड होने पर IPC 420 के तहत FIR दर्ज कराएं।