AQI स्तर: अलर्ट मोड में NCR, दिल्ली सबसे ऊपर
सैटर्डे सुबह के आंकड़ों ने सबको चौंका दिया। नोएडा में 561 का AQI मतलब है कि हवा में मौजूद प्रदूषक इतने घातक हैं कि सामान्य व्यक्ति को बाहर निकलना खतरनाक साबित हो सकता है। फरीदाबाद का स्तर 412 (सीवियर) था, जहां PM2.5 और PM10 का प्रभुत्व देखा गया। न्यू दिल्ली में 312 का AQI ‘वेरी पुअर टू सीवियर’ श्रेणी में आता है, जबकि गुरुग्राम (297) और गाजियाबाद (268) ‘वेरी पुअर’ में।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की एनालिसिस में 11 प्रमुख भारतीय शहरों के डेटा का अध्ययन किया गया। नतीजा चौंकाने वाला – कोई भी शहर सालाना औसत AQI में ‘सेफ’ स्तर (100 से नीचे) हासिल नहीं कर सका। दिल्ली का औसत AQI 2025 में करीब 180 रहा, जो दशक भर से सबसे ऊंचा है। उत्तर भारत के शहर जैसे लखनऊ, वाराणसी और अहमदाबाद में लगातार बिगड़ते स्तर देखे गए। दूसरी ओर, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, चंडीगढ़ और विशाखापत्तनम में अपेक्षाकृत बेहतर लेकिन असुरक्षित AQI रहा। बेंगलुरु मेट्रो शहरों में सबसे साफ हवा वाला रहा, फिर भी ‘गुड’ कैटेगरी से ऊपर। 2020 के बाद कुछ शहरों में सुधार दिखा, लेकिन सर्दी का स्मॉग सबको लील गया। दिलचस्प बात – 2025 में पराली जलाने की घटनाएं काफी घटीं, फिर भी दिल्ली की हवा साफ नहीं हुई। इसका मतलब साफ है – लोकल सोर्स और मौसम की भूमिका बड़ी है।
प्रदूषण के कारण: मौसम, ट्रैफिक और इंडस्ट्री का घालमेल
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का जड़ कारण शहरीकरण, ट्रैफिक जाम, इंडस्ट्रियल इमिशन और मौसम की मार है। इंडो-गंगा मैदान में भौगोलिक और मौसम संबंधी फैक्टर सर्दियों में स्मॉग को स्थायी बना देते हैं। अक्टूबर से कम बारिश और कमजोर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ने प्राकृतिक प्रदूषकों के फैलाव को रोक दिया। नतीजा – समय से पहले स्मॉग की चादर। रिपोर्ट में कहा गया कि यह समस्या राष्ट्रीय स्तर की है, जो लगातार और संरचनात्मक है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, फैक्ट्रियों का कचरा और कंस्ट्रक्शन धूल मिलकर हवा को जहरीला बना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना साइंस-बेस्ड पॉलिसी के यह चक्र टूटेगा नहीं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: सांस की बीमारियां, बच्चों पर खतरा
हैजर्डस AQI का सबसे ज्यादा असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। PM2.5 कण फेफड़ों में घुसकर सांस संबंधी बीमारियां जैसे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस बढ़ा रहे हैं। बच्चे, बुजुर्ग और हृदय रोगी सबसे ज्यादा खतरे में हैं।
दिल्ली के अस्पतालों में सांस की शिकायतों के केस 30% बढ़ गए हैं।
लंबे समय तक एक्सपोजर से कैंसर और हार्ट अटैक का रिस्क भी बढ़ जाता है
। WHO के अनुसार, 300 से ऊपर AQI ‘अनहेल्दी’ है, जो यहां पार हो चुका। ग्रामीणों का कहना है
, “बाहर निकलते ही गला खराब हो जाता है, आंखें जलती हैं।”
सरकारी कदम: GRAP लागू, लेकिन पर्याप्त नहीं
सरकार ने GRAP (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) के तहत स्कूल बंद कर दिए, ऑड-ईवन लागू किया
और कंस्ट्रक्शन पर रोक लगा दी। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये अस्थायी उपाय हैं।
क्लाइमेट ट्रेंड्स ने सिफारिश की – लोकल पॉल्यूशन सोर्स पर कंट्रोल, ग्रीन ट्रांसपोर्ट और वेस्ट मैनेजमेंट जरूरी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र और राज्य को फटकार लगाई है।