नई दिल्ली, 24 नवंबर 2025 – सर्दियों का मौसम आते ही दिल्ली की हवा फिर से जहर बन गई है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 400 से ऊपर पहुंचने के बाद शहरवासी सांस लेने को तरस रहे हैं, लेकिन प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दबाने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। नवंबर के दूसरे हफ्ते से इंडिया गेट पर हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अचानक हिंसक रूप ले लिया है, जिससे राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया। मांएं-बच्चे, पर्यावरण कार्यकर्ता और छात्र साफ हवा की मांग कर रहे थे, लेकिन पुलिस कार्रवाई, माओवादी पोस्टर और मिर्च स्प्रे हमले ने इसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया। आइए, इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
प्रदूषण का संकट: क्यों फूटा गुस्सा?
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण हर साल नवंबर-दिसंबर में चरम पर पहुंच जाता है। पराली जलाना, वाहनों का धुआं, निर्माण कार्य और मौसमी बदलाव इसे और भयावह बनाते हैं। 2025 में स्थिति और खराब हो गई – 9 नवंबर को कई इलाकों में AQI 450 को पार कर गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, यह ‘गंभीर’ स्तर है, जो बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के लिए घातक साबित हो रहा है। अस्पतालों में सांस की बीमारियों के मरीजों की संख्या 30% बढ़ गई है।
इस संकट के बीच, 9 नवंबर को इंडिया गेट पर पहला बड़ा प्रदर्शन हुआ। ‘क्लीन एयर नाउ’ कैंपेन के तहत सैकड़ों लोग इकट्ठा हुए। मांएं अपने बच्चों को साथ लेकर प्लेकार्ड थामे नारे लगा रही थीं – ‘सांस लेना है हक हमारा’, ‘दिल्ली हेल्थ के लिए हानिकारक’। पर्यावरण कार्यकर्ता भावरीन खंडारी ने कहा, “हम मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे, लेकिन इजाजत नहीं मिली। बच्चे सांस नहीं ले पा रहे, फिर भी सरकार सो रही है।” प्रदर्शनकारी एयर क्वालिटी मॉनिटर लेकर प्रदूषण का जीवंत डेटा दिखा रहे थे। लेकिन दिल्ली पुलिस ने ‘सुरक्षा प्रोटोकॉल’ का हवाला देकर 50-100 लोगों को हिरासत में ले लिया। डीसीपी देवेश कुमार महला ने बताया, “इंडिया गेट प्रदर्शन स्थल नहीं है। केवल जंतर-मंतर पर अनुमति से प्रदर्शन हो सकता है।”
यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। पूर्व केंद्रीय मंत्री शोभ्रा सिंहवी जैसे नेताओं ने इसे ‘लोकतंत्र का गला घोंटना’ बताया, जबकि बीजेपी समर्थकों ने प्रदर्शनकारियों को ‘अराजक तत्व’ करार दिया।
23 नवंबर: शांतिपूर्ण विरोध से हिंसा तक
पहले प्रदर्शन के बाद भी प्रदूषण कम न होने पर 23 नवंबर को ‘दिल्ली कोऑर्डिनेशन कमिटी फॉर क्लीन एयर’ ने दूसरा प्रदर्शन बुलाया। दोपहर 4 बजे इंडिया गेट के सी-हेक्सागन इलाके में 50-60 लोग जमा हुए। नारे लगे – ‘नो मोर डीजल, क्लीन एयर नाउ’। लेकिन जल्द ही तनाव बढ़ गया। प्रदर्शनकारियों ने सड़क ब्लॉक करने की कोशिश की, तो पुलिस ने हस्तक्षेप किया।
यहां विवाद की जड़ उभरी। वीडियो फुटेज में दिखा कि कुछ प्रदर्शनकारी माओवादी कमांडर माधवी हिडमा के पोस्टर लहरा रहे थे। हिडमा, जो सीपीआई (माओवादी) के बैटालियन नंबर 1 का कमांडर था, 18 नवंबर को आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। उसके सिर पर 1 करोड़ का इनाम था। पोस्टर पर लिखा था – ‘बिरसा मुंडा से माधवी हिडमा तक,
जंगलों और पर्यावरण की लड़ाई जारी रहेगी’। यह देखते ही हड़कंप मच गया। क्या प्रदूषण विरोध को नक्सल समर्थन से जोड़ दिया गया?
तनाव चरम पर पहुंचा जब प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर पुलिस पर मिर्च पाउडर और पेपर स्प्रे का इस्तेमाल किया।
तीन-चार पुलिसकर्मी घायल हो गए, जिन्हें आरएमएल अस्पताल ले जाया गया।
डीसीपी महला ने कहा, “प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ रहे थे, हमने रोकने की कोशिश की तो उन्होंने हमला किया।
तीन पेपर स्प्रे कैन बरामद हुए।”
परिणामस्वरूप, 15-20 लोगों को हिरासत में लिया गया। एफआईआर दर्ज हुई – सड़क अवरोध, पुलिस
पर हमला और विवादास्पद पोस्टरों के लिए। फोरेंसिक जांच चल रही है।
विवाद के कई आयाम: राजनीति से सुरक्षा तक
यह प्रदर्शन केवल प्रदूषण तक सीमित न रहा। माओवादी पोस्टर ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया।
सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई – कुछ ने इसे ‘पर्यावरण-आदिवासी संघर्ष’ से जोड़ा, तो कुछ ने ‘देश-विरोधी साजिश’ कहा।
एएपी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा – “यह हेल्थ इमरजेंसी है,
लेकिन मोदी जी क्लाउड सीडिंग जैसे फेल एक्सपेरिमेंट पर अड़े हैं।
बीजेपी ने प्रदर्शनकारियों को ‘अराजक’ बताते हुए कहा कि प्रदूषण पर काम हो रहा है – 271 वाटर स्प्रिंकलर तैनात हैं।
पर्यावरण समूहों का कहना है कि सरकार लंबे समाधान (जैसे इंडस्ट्रीज शिफ्ट, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) से भाग रही है।
क्रांति नाम की कार्यकर्ता ने कहा, “महिलाओं पर पुरुष पुलिसकर्मियों ने क्रूरता की। हम शांतिपूर्ण थे, लेकिन दबाए गए।”
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर पुलिस ने कार्रवाई जायज ठहराई, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन’ कहा।
पिछले प्रदर्शनों में भी इसी तरह की हिरासतें हुईं। गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक,
पुलिस ने प्रदर्शन से पहले सैकड़ों कॉल्स और घरेलू विजिट्स कीं।
सौरव दास जैसे युवा कार्यकर्ता ने कहा, “हम सांस लेना चाहते हैं, लेकिन सरकार हमें चुप करा रही है।”