नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की विदाई समारोह में एक गर्मजोशी और भावनाओं से भरा संबोधन दिया। समारोह के दौरान उन्होंने कहा, “आज जो कुछ भी हूं, इन दो लोगों की वजह से हूं।” उनका यह बयान न सिर्फ कोर्टरूम के भीतर मौजूद जजों के लिए, बल्कि न्यायपालिका की आत्मा को भी छू गया।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने सहयोगी न्यायमूर्ति गवई को एक ईमानदार, संवेदनशील और लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रेरित न्यायाधीश बताया। उन्होंने कहा कि गवई का जीवन सफर यह दिखाता है कि कैसे दृढ़ता, मेहनत और संवेदनशीलता से कोई भी व्यक्ति देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच सकता है।
इन दो की वजह से हूं” — आखिर कौन हैं वे दो?
अपने संबोधन के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि वे दो व्यक्ति, जिनका उन्होंने उल्लेख किया, उनकी जिंदगी और करियर के निर्माण में अहम रहे। पहला नाम उनके पिता, स्वर्गीय न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़ का है, जो देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्य न्यायाधीश रहे। दूसरा नाम उन्होंने न्यायमूर्ति गवई का लिया। उन्होंने कहा कि इन दोनों ने उन्हें समझाया कि न्याय केवल कानून की किताबों से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी किया जाता है।
दरगाह का उल्लेख और उसका संदर्भ
समारोह के एक भावनात्मक हिस्से में चंद्रचूड़ ने दरगाह की मिसाल देते हुए कहा कि न्यायपालिका भी एक “दरगाह” की तरह है — जहाँ आने वाले हर व्यक्ति की फरियाद सुनी जाती है, उसके धर्म, जाति या पहचान की परवाह किए बिना। उन्होंने कहा, “हमारा कोर्ट भी एक दरगाह की तरह है — जहाँ हर व्यक्ति को न्याय रूपी सुकून की तलाश होती है।”
इस बयान ने पूरे कार्यक्रम का माहौल और भी भावनात्मक बना दिया। यह उदाहरण भारतीय न्याय व्यवस्था की उस सर्वसमावेशी भावना का प्रतीक थी, जिसमें विश्वास, करुणा और समानता तीनों का समावेश है।
न्यायमूर्ति गवई की यात्रा: संघर्ष से शिखर तक
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई का जीवन संघर्ष और सफलता का संगम है। महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक छोटे कस्बे में जन्मे गवई ने अपने शुरुआती जीवन में अनेक सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने हमेशा न्याय की भावना से प्रेरित होकर कार्य किया।उनके पिता, पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष रंभाउ गवई, समाजसेवा और दलित उत्थान के लिए समर्पित रहे। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गवई ने कानून को सामाजिक न्याय का माध्यम बनाया। बॉम्बे हाईकोर्ट में वर्षों की सेवा के बाद जब वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब उन्होंने कई ऐतिहासिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विविधता और समावेशिता पर चंद्रचूड़ का संदेश
मुख्य न्यायाधीश ने गवई की विदाई के बहाने भारत की न्यायपालिका में विविधता और समावेशन की अहमियत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को देश की जनता की विविधता को प्रतिबिंबित करना चाहिए। गवई की मौजूदगी कोर्ट में इस बात का प्रमाण रही कि प्रतिभा और योग्यता किसी जाति या पृष्ठभूमि से सीमित नहीं होती।
विदाई का भावनात्मक क्षण
जब न्यायमूर्ति गवई ने अपने साथियों को धन्यवाद दिया, तब पूरा कोर्टरूम भावुक हो उठा। उन्होंने कहा कि यह यात्रा उनके परिवार, सहयोगियों और वरिष्ठों के सहयोग से ही संभव हुई। गवई ने यह भी कहा कि उन्होंने हमेशा कोशिश की कि न्याय के फैसले में आम नागरिक की आवाज सुनाई दे।
जनता तक न्याय पहुंचाने की प्रतिबद्धता
समारोह के दौरान दोनों न्यायाधीशों ने यह भी चर्चा की कि भारत की न्यायपालिका को और ज्यादा सुलभ और पारदर्शी बनाना ही आने वाले वक्त की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। चंद्रचूड़ ने बताया कि तकनीक के प्रयोग से अब देश के सुदूर इलाकों में बैठे लोग भी सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही देख सकते हैं, जो लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धि है।
सोशल मीडिया पर चर्चा
विदाई समारोह के बाद सोशल मीडिया पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के बयान को खूब साझा किया गया। कई लोगों ने इसे भारतीय न्यायपालिका में मानवता की झलक बताया। ट्विटर (अब X) और लिंक्डइन पर “#CJI_Gavai_Farewell” ट्रेंड करता रहा। लोगों ने कहा कि यह सिर्फ एक विदाई नहीं, बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली में मानवीय मूल्यों की पुनर्पुष्टि थी।