सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति और राज्यपालों के विधेयकों पर मंजूरी देने के लिए समय सीमा तय करने से साफ इनकार कर दिया है। हाल में राष्ट्रपति की ओर से मांगे गए संदर्भ पर यह फैसला सुनाया गया, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को बिलों पर मंजूरी या अस्वीकृति देने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा बाध्य नहीं की जा सकती। अदालत ने ‘डिम्ड असेंट’ (माने हुए सहमति) की अवधारणा को भी खारिज कर दिया है, जिसमें बिल पर तय समय में कोई निर्णय न लेने पर स्वतः मंजूरी मान ली जाती थी
फैसले की प्रमुख बातें
1 सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने कहा कि संविधान ने राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधेयकों पर मंजूरी देने के मामले में पर्याप्त ‘इलास्टिसिटी’ यानी लचीलापन दिया है और अदालत द्वारा कोई समय-सीमा निर्धारित करना संविधान की आत्मा और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है
2 अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास आए राज्य विधानसभाओं के बिलों पर कार्रवाई न करना (इनएक्शन) ठीक नहीं है, लेकिन इसके लिए भी कोर्ट किसी निश्चित समय-सीमा नहीं थोप सकता. बिल पर ‘डिम्ड असेंट’ की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं है, यानी इसे स्वतः पास मान लेना संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के खिलाफ है
3 संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी बिल जब तक कानून न बन जाए, तब तक राष्ट्रपति और राज्यपाल के क्रियाकलापों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं लिया जा सकता
न्यायालय ने केवल इतने भर की गुंजाइश छोड़ी है कि अत्यधिक देरी की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल/राष्ट्रपति को निर्णय लेने के लिए निर्देश दे सकता है
राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की सत्ता
4 अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्यपाल किसी बिल पर मंजूरी दे सकता है, अस्वीकार कर सकता है, या राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेज सकता है।अनुच्छेद 201 के अनुसार राष्ट्रपति को जब कोई बिल भेजा जाता है, तो वह मंजूरी, अस्वीकृति या पुनर्विचार का निर्देश दे सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि इस प्रक्रिया में किसी तरह का निश्चित समय-सीमा लागू नहीं किया जा सकता
5 अनुच्छेद 201 के अनुसार राष्ट्रपति को जब कोई बिल भेजा जाता है, तो वह मंजूरी, अस्वीकृति या पुनर्विचार का निर्देश दे सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि इस प्रक्रिया में किसी तरह का निश्चित समय-सीमा लागू नहीं किया जा सकता
फैसले का प्रभाव
यह फ़ैसला संघीय व्यवस्था और राज्य सरकारों की विधायी प्रक्रिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास आए बिलों को मंजूरी देने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है, लेकिन वे अनावश्यक रूप से किसी बिल को अनिश्चितकालीन नहीं रोक सकते
सुप्रीम कोर्ट की राय निश्चित रूप से फैसले के तौर पर लागू नहीं होती, बल्कि यह सलाह के रूप में मानी जाती है, लेकिन इसकी संवैधानिक व्याख्या सरकार और अदालतों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगी