संघ में केवल “हिंदू” ही शामिल हो सकते हैं, लेकिन यहाँ “हिंदू” का मतलब केवल धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान से है। उनका कहना है कि जो भी भारत का मूल निवासी है और इस भूमि को अपनी मातृभूमि मानता है, वह हिंदू है।
हालांकि, संघ में मुसलमान, ईसाई या ब्राह्मण कोई भी व्यक्ति शामिल नहीं हो सकता। लेकिन संघ में विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग, जैसे मुसलमान और ईसाई भी, शाखाओं में आ सकते हैं यदि वे अपनी धार्मिक या जातिगत विशेषताओं को बाहर रख देते हैं और “भारत माता के पुत्र” के रूप में एक होकर आते हैं।

भागवत का यह दृष्टिकोण संघ के एकता और अखंडता पर आधारित है, जहाँ वे चाहते हैं कि सभी लोग अपनी विशेषताओं को दरकिनार कर राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता की भावना से जुड़ें। संघ की शाखाओं में चाहे कोई भी आए, उसका धर्म, जाति या denomination मायने नहीं रखता, बल्कि वह सब भारत माता के पुत्र हैं।
संघ न जाति धर्म पूछता है और न ही गिनती करता है, वह एक समावेशी समाज की बात करता है जिसका केंद्र है भारत माता की संतान होना।इसलिए जब मोहन भागवत कहते हैं कि ‘ब्राह्मण, मुसलमान और ईसाई को संघ में कोई जगह नहीं’, इसका मतलब है कि संघ का सदस्य केवल सांस्कृतिक और राष्ट्रीय रूप से हिंदू होने पर हो सकता है, न कि किसी विशेष धर्म या जाति पर आधारित सदस्यता की अनुमति है।
मगर ये सभी अपने विचार, अपनी विशिष्टताएं लेकर शाखाएं आ सकते हैं, परंतु विभाजन छोड़कर एक संयुक्त हिंदू समाज के रूप में शामिल होना होगा। यह संघ की समावेशी लेकिन सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी नीति का प्रतिबिंब है