फैसला गिरफ्तारी के संदर्भ में व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को बहुत मजबूत करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अपराध की गिरफ्तारी के समय या उसके तुरंत बाद आरोपी को गिरफ्तार करने का लिखित आधार देना अनिवार्य होगा।
यह लिखित सूचना ऐसी भाषा में होनी चाहिए जो आरोपी को पूरी तरह समझ आए।यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनाया है, जिसमें उन्होंने कहा कि आरोपी को गिरफ्तारी का कारण केवल मौखिक रूप में नहीं, बल्कि लिखित रूप में भी बताना आवश्यक है।
यदि आपातकाल की स्थिति में तुरंत लिखित सूचना देना संभव नहीं हो, तब भी उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेशी से कम से कम दो घंटे पहले लिखित रूप में प्रदान करना ज़रूरी होगा। यह कानून भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 50 और नए बीएनएस संहिता की धारा 47 के तत्पर्य को मजबूत करता है।कोर्ट ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के लिखित आधार की सूचना न देने वाली गिरफ्तारी को अवैध माना जाएगा और उस स्थिति में गिरफ्तार व्यक्ति को रिहा करने का आदेश दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को सभी अपराधों पर लागू किया है, चाहे वे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत हों या कोई विशेष कानून जैसे पीएमएलए या यूएपीए के अंतर्गत।
इस फैसले के पीछे सार यह है कि गिरफ्तारी का लिखित आधार मिलने से आरोपी को अपनी रिहाई या बचाव के लिए उचित समय और जानकारी मिलती है, जिससे वह न्यायिक प्रणाली में न्यायपूर्ण भागीदारी कर सके। मजिस्ट्रेट के सामने पेशी से दो घंटे पहले लिखित सूचना का नियमन इसलिए बनाया गया है ताकि आरोपी के लिए अपने पक्ष को रखने का उचित और पर्याप्त समय सुनिश्चित हो सके।इस फैसले से पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए यह बाध्यता आ गई है कि वे गिरफ्तारी के निर्णय के कारणों को पारदर्शी बनाएँ और गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों का पूरा सम्मान करें।
यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान सुरक्षा के अधिकार) के संरक्षण को सुनिश्चित करता है।इस प्रकार, इस ऐतिहासिक फैसले ने व्यक्तियों को गिरफ्तारी के समय मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए एक मज़बूत सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जो पुलिस रिकॉर्ड की पारदर्शिता और जवाबदेही को भी बढ़ावा देता है।
यदि किसी भी परिस्थिति में यह लिखित सूचना प्रदान नहीं की जाती है, तो न केवल गिरफ्तारी अमान्य होगी, बल्कि आरोपी को तुरंत रिहा करने का अधिकार भी होगा।यह निर्णय पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया है और भारतीय न्याय प्रणाली में व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।