फिशरमैन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिशरमैन चंद्रभान निषाद का तीखा बयान: “सरकार मुफ्त में सब कुछ दे रही है, लेकिन जनता से शिक्षा और दवा के नाम पर खून चूस रही है”
आज जब सरकार मुफ्त की योजनाओं का अंबार लगा रही है —
कहीं मुफ्त में शौचालय, कहीं मुफ्त में मकान, कहीं मुफ्त यात्रा —
तब भी इस देश का गरीब किसान
, मजदूर और मछुआरा यह सवाल पूछने को मजबूर है कि आखिर मुफ्त में दवा और शिक्षा क्यों नहीं मिलती?
फिशरमैन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिशरमैन चंद्रभान निषाद ने जनता की आवाज़ बनते हुए कहा कि आज देश में ‘‘वोट के लिए’’

मुफ्त योजनाओं की झड़ी लगा दी गई है,
लेकिन असली ज़रूरत की चीज़ें — यानी दवा और शिक्षा — आज भी गरीब की पहुंच से बाहर हैं।
उन्होंने कहा, “सरकार जनता को हर वो चीज़ दे रही है जिससे उसका नाम चमक सके, लेकिन बच्चों के भविष्य और बुज़ुर्गों की ज़िंदगी की कीमत पर।
स्कूलों की फीस आसमान छू रही है, अस्पतालों के बिल गरीब की कमर तोड़ रहे हैं।
क्या यही ‘विकसित भारत’ का सपना था?
”चंद्रभान निषाद ने भावुक होते हुए कहा कि आज गांव का बच्चा अपनी आंखों में बड़ा सपना लिए स्कूल जाना चाहता है, लेकिन गरीबी उसे बीच रास्ते पर रोक देती है
। माँ अपने बीमार बेटे को दवा के लिए सरकारी अस्पताल ले जाती है, लेकिन इलाज के बिना ही लौटा दी जाती है।
और सरकार कहती है
‘‘सब ठीक है, सबको सुविधा मिल रही है!”उन्होंने कहा, “मुफ्त का मकान अगर बिना पढ़े दिमाग में बसे, तो वह अंधेरे से ज्यादा कुछ नहीं।
मुफ्त यात्रा अगर बिना इलाज के शरीर को ढो रही हो, तो वह सफर मौत की ओर जाता है।
सरकार को समझना होगा — असली मुफ्तखोरी तब है, जब जनता को
बराबरी का हक और जीवन का अवसर ना मिले।”निषाद ने यह भी कहा कि आज जरूरत है
‘‘मुफ्त घोषणाओं’’ की नहीं बल्कि ‘‘जनकल्याण की नीतियों’’ की।
शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार सिर्फ कागज़ों पर नहीं, ज़मीन पर उतरना चाहिए।
जब तक हर बच्चा स्कूल में नहीं जाएगा और हर परिवार को सस्ती दवा नहीं मिलेगी,
तब तक विकास अधूरा रहेगा।
“हम चाहते हैं कि सरकार दिखावे की योजनाओं से आगे बढ़े —
गांव-गांव में शिक्षा केंद्र खोले, हर नागरिक को मुफ्त या सस्ती दवा उपलब्ध कराए।
तब जाकर देश सच में आत्मनिर्भर बनेगा।
”फिशरमैन चंद्रभान निषाद का यह संदेश आज हर उस आम आदमी की आवाज़ है,
जो दो वक्त की रोटी, अच्छी शिक्षा और इलाज के लिए तरस रहा है। उन्होंने दो टूक कहा —
‘‘सरकार हमें शौचालय नहीं, स्कूल दो; हमें यात्रा नहीं, चिकित्सा दो;
क्योंकि मकान से नहीं, इंसानियत से ही देश बनता है।”