यह खबर बताती है कि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) विभाग के कुछ अधिकारियों ने अपनी काली कमाई छुपाने के लिए पूर्वांचल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पहाड़ खरीद लिए हैं।
इन पहाड़ों को खरीदने के पीछे इन अधिकारियों का मकसद अपनी गैरकानूनी और बेहिसाब संपत्ति को छुपाना और कागजों में कानूनी बनाना है। खबर में यह भी बताया गया है कि एक पहाड़ की एवरेज रॉयल्टी सालाना 20 से 30 करोड़ रुपये हो सकती है,
जिससे इन लोगों को बड़ी आमदनी भी होती है।खबर का विस्तारपूर्वांचल क्षेत्र में कई जीएसटी और अन्य सरकारी विभागों के अधिकारियों ने अपने पद और रसूख का इस्तेमाल कर बीते कुछ वर्षों में कई पहाड़ खरीदे हैं। ये अधिकारी पता नहीं चलने देने के लिए अपने रिश्तेदारों, करीबी दोस्तों, या प्रॉक्सी के नाम से खरीदी का कागज तैयार करवाते हैं
। इन पहाड़ों की खरीद के बाद ये लोग वहां माइनिंग, क्रशर यूनिट, या रेत-बजरी का अवैध कारोबार चालू कर देते हैं। इसमें काफी रकम कैश की होती है, जिससे उनकी काली कमाई की हेराफेरी आसानी से हो जाती है।पहाड़ की रॉयल्टी और कमाईएक औसत पहाड़ से सालाना रॉयल्टी 20 से 30 करोड़ रुपये होती है
। माइनिंग के दौरान निकाले गए पत्थरों, रेत, मिट्टी, आदि की बिक्री बाकायदा सरकारी रॉयल्टी पर होती है पर असल कमाई अवैध निकासी और ब्लैक में बिक्री से होती है। इन पहाड़ों पर स्थापित क्रशर यूनिटों से बनने वाला ग्रिट, रेत, और अन्य निर्माण सामग्री सीधे बड़े बिल्डरों, हाइवे प्रोजेक्ट्स, और बड़े ग्राहकों को बेची जाती है।
बहुत सा माल रॉयल्टी अथवा टैक्स चोरी करके ब्लैक में भी बिकता है जिससे अवैध रूप से बेशुमार धन पैदा होता है।खरीददारी की प्रक्रियाइन पहाड़ों की खरीददारी बेहद गोपनीय ढंग से की जाती है। पहाड़ की रजिस्ट्री किसी परिचित या भरोसेमंद व्यक्ति के नाम करवा दी जाती है।
कुछ मामलों में तो पहाड़ की रजिस्ट्री ऐसे गरीब या ग्रामीण के नाम कर दी जाती है, जिनके ऊपर कोई शक न हो। रियल एस्टेट के जानकार बताते हैं कि 2017 से अब तक पूर्वांचल में 50 से अधिक पहाड़ों की रजिस्ट्री जीएसटी, एक्साइज, मिनरल विभाग के कर्मचारियों और अफसरों के नाम अथवा उनके नजदीकी रिश्तेदारों के नाम हो चुकी है
।कालाबाजारी और काले धन को सफ़ेद करने का तरीकाइन पहाड़ों में काफी हद तक काले धन का निवेश किया जाता है। सबसे पहले ब्लैक कैश को नकद या ट्रांजैक्शन के जरिये इनवेस्ट किया जाता है। इसके बाद पहाड़ की कागजी रजिस्ट्री; और फिर माइनिंग व व्यापारिक गतिविधियों से नकद कमाई; ये पूरी प्रक्रिया जितनी सरल बाहर से दिखती है,
अंदर से उतनी ही जटिल और गोपनीय है। माइनिंग यूनिट संचालक नकद में माल बेचकर नकद पहुंचाते हैं जिसे अधिकारी बाद में अन्य संपत्ति में तब्दील कर लेते हैं।रॉयल्टी, टैक्स और सिस्टम की खामियांरेत की सरकारी रेट सिर्फ 160 रुपये प्रति घनमीटर है
जबकि ब्लैक में इसका भाव 3000 रुपये प्रति घनमीटर तक जा पहुंचता है। सिस्टम में अधिकारियों की मिलीभगत से बिना कागज माल निकालना और बेचना आम हो चला है। कई बार स्टेट खनिज विभाग और जीएसटी इकाइयां एक-दूसरे पर नजर डालकर अपनी कमाई सुनिश्चित करती हैं।
टैक्स न भरने पर होने वाला घाटा सरकार के खजाने को होता है जिससे घाटा जनता को उठाना पड़ता है।नकली दस्तावेज और घाटाइन पहाड़ों की खरीद से जुड़ी कई बार फर्जी कागजात भी बनवाए जाते हैं। जैसे ही पहाड़ के दस्तावेज किसी प्रॉक्सी के नाम रजिस्टर्ड हुए, उसके बाद उनसे जाली दस्तावेजों पर लोन लेना, सरकारी ग्रांट और सब्सिडी लेना शुरू हो जाता है
। प्रशासन अक्सर शिकायत मिलने पर ही जांच करता है, वरना ऐसे मामलों में जांच के नाम पर कागजी खानापूर्ति कर दी जाती है।स्टोन क्रशर यूनिट्स और घाटाइन पहाड़ों पर दर्जनों की संख्या में स्टोन क्रशर यूनिट्स लगाई जा चुकी हैं। इनसे बनने वाली ग्रिट, पक्की सड़क परियोजनाओं, फ्लाईओवर, रेलवे, और खासतौर से प्राइवेट बिल्डरों को भेज दी जाती है।
विभागीय मिलीभगत से प्रतिदिन हजारों ट्रकों की डिलीवरी होती है जिसमें से अधिकतर की एंट्री कागजों में नहीं होती। इससे सरकार के रेवेन्यू पर बड़ा असर पड़ता है।अवैध कमाई का नेटवर्कये अफसर न सिर्फ खुद के लिए, बल्कि साथी मित्रों, रिश्तेदारों और अन्य कारोबारियों के लिए भी मनी लॉन्ड्रिंग का नेटवर्क तैयार कर लेते हैं। अरबों रुपये का काला धन ‘पहाड़ के व्यापार’ की आड़ में राइट-ऑफ किया जाता है। हालत यह है
कि सरकारी भ्रष्टाचार के बड़े आरोपी अफसरों की जांच के दौरान जब इनके नाम संपत्ति खंगाली जाती है, तो गाँव, पहाड़, जमीन, प्लॉट, सब कुछ मिल जाता है – ज्यादातर ऐसी जगह जहाँ इन अफसरों की कोई सीधी रुचि या स्थानीयता नहीं।ऐक्शन और सुधार की जरूरतइस पूरे मामले में विभागीय जांच और सख्त रेगुलेशन की जरूरत है।
हर विभाग को पहाड़ों, रेत-बजरी घाटों, और क्रशर यूनिटों की स्वामित्व से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही संपत्ति की जांच के लिए हर साल अफसरों की नेटवर्थ, खनिज क्षेत्र की आय, रॉयल्टी व टैक्स पेमेंट की पारदर्शी पड़ताल होनी चाहिए। जिससे ऐसे मामलों पर तत्काल रोक लगे और अगर कोई दोषी पाए जाए तो सख्त कानूनी कार्रवाई संभव हो सके।
