गोरखपुर की धरती हमेशा से संघर्षशील और सामाजिक चेतना से भरपूर रही है। इसी धरती पर पले-बढ़े समाजसेवी राजा निषाद आज निषाद समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल के लिए एक मिसाल बनकर खड़े हैं।
राजा निषाद का नाम सुनते ही लोगों के मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है जो जुझारूपन, ईमानदारी, संघर्ष और समाज के लिए समर्पण का प्रतीक हैं।
उनका जीवन केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि सामूहिक उत्थान का अद्भुत उदाहरण है।
राजा निषाद ने हमेशा उन गरीब, वंचित और उपेक्षित लोगों के लिए आवाज उठाई जिनकी आवाज अक्सर शासन-प्रशासन तक नहीं पहुँच पाती।
गोरखपुर और आसपास के गाँवों-कस्बों में अगर किसी गरीब का शोषण हुआ है, तो राजा निषाद सबसे पहले उसके साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
(1) राजा निषाद का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा।
(2) उन्होंने गरीबी देखी, अभाव देखे और समाज के भेदभाव को करीब से महसूस किया।
(3) इन्हीं अनुभवों ने उन्हें समाजसेवा की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।
(4) राजा निषाद का मानना है कि जब तक समाज के अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति खुशहाल नहीं होगा, तब तक समाज का असली विकास अधूरा रहेगा।
(5) यही विचार उन्हें बाकी नेताओं और समाजसेवियों से अलग बनाता है।
राजा निषाद की ईमानदारी का आलम यह है कि आज के भ्रष्ट और अवसरवादी माहौल में भी लोग उन पर आंख बंद करके भरोसा करते हैं।
वे न तो निजी स्वार्थ में काम करते हैं और न ही अपने लिए सत्ता-संपत्ति की होड़ में पड़ते हैं।
उनका एक ही लक्ष्य है—समाज को न्याय दिलाना और निषाद समाज सहित सभी वंचित तबकों को उनका हक दिलाना।
(6) गोरखपुर में शिक्षा के क्षेत्र में राजा निषाद ने कई उल्लेखनीय काम किए।
(7) गरीब बच्चों को पढ़ाई के लिए किताबें, कॉपी और फीस की व्यवस्था करना उनकी प्राथमिकता रही है।
(8) उन्होंने गाँवों में शिक्षा शिविर लगवाए और बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
(9) राजा निषाद का यह मानना है कि शिक्षा ही वह हथियार है, जो किसी भी समाज को गरीबी और पिछड़ेपन से बाहर निकाल सकता है।
(10) इसीलिए वे बच्चों की पढ़ाई में कोई रुकावट न आने दें, इसके लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।
राजा निषाद का संघर्ष केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है।
(11) उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को भी गरीबों तक पहुँचाने के लिए काम किया।
(12) गाँव-गाँव जाकर स्वास्थ्य शिविर लगवाना और लोगों को जागरूक करना उनकी प्राथमिकता रही।
(13) गोरखपुर और आसपास के इलाके में अगर कोई बीमार गरीब व्यक्ति अस्पताल का खर्च नहीं उठा पाता, तो राजा निषाद स्वयं मदद के लिए आगे बढ़ जाते हैं।
(14) कई बार उन्होंने अपने निजी संसाधनों से भी गरीबों की दवाइयों का इंतज़ाम किया।
(15) यही कारण है कि लोग उन्हें “गरीबों का सहारा” भी कहते हैं।
(16) समाज में व्याप्त कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ भी उन्होंने मोर्चा खोला है।
(17) राजा निषाद दहेज प्रथा, नशाखोरी और जातिगत भेदभाव के सख्त खिलाफ हैं।
(18) वे गाँवों में जागरूकता अभियान चलाते हैं और युवाओं को इन बुराइयों से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं।
(19) उनका कहना है कि अगर समाज को बदलना है तो सबसे पहले बुराइयों को खत्म करना होगा।
(20) इसलिए वे हमेशा युवाओं को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का संदेश देते हैं।
राजा निषाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—उनका जुझारूपन।
(21) जब भी समाज पर संकट आया, वे पीछे नहीं हटे।
(22) चाहे प्रशासन से टकराना पड़ा हो या बड़ी ताकतों से भिड़ना, उन्होंने कभी डर कर समझौता नहीं किया।
(23) उनकी यह निडरता ही उन्हें लोगों का प्रिय बनाती है।
(24) वे हमेशा कहते हैं कि अन्याय के सामने झुकना पाप है।
(25) इसलिए वे हर स्थिति में गरीबों और पीड़ितों के साथ खड़े रहते हैं।
(26) गोरखपुर और आसपास के निषाद समाज में जागरूकता फैलाने का श्रेय भी राजा निषाद को जाता है।
(27) उन्होंने समाज को अपनी ताकत पहचानने और अपने अधिकारों के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी।
(28) वे हमेशा कहते हैं कि एकता में ही शक्ति है।
(29) अगर समाज संगठित होगा तो उसे उसका हक ज़रूर मिलेगा।
(30) इस विचार के साथ उन्होंने कई सामाजिक आंदोलन खड़े किए।
राजा निषाद का संघर्ष केवल निषाद समाज तक सीमित नहीं रहा।
(31) उन्होंने हर उस वर्ग के लिए आवाज उठाई जो कमजोर और वंचित था।
(32) उनकी नजर में इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्म और ईमानदारी से होती है।
(33) यही वजह है कि हर वर्ग और हर धर्म के लोग उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं।
(34) गोरखपुर के गाँवों में जब भी कोई संकट आता है, लोग सबसे पहले राजा निषाद का नाम लेते हैं।
(35) उनका यह विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है।