टेक्नीशियन भर्ती में फर्जीवाड़ा: स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर सवाल
गोरखपुर/लखनऊ, 15 सितंबर 2025 (अमर उजाला ब्यूरो)
स्वास्थ्य विभाग में लंबे समय से हो रही तकनीशियन भर्ती अब सवालों के घेरे में है। 2008 से लेकर 2016 तक हुई भर्तियों में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा और गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं। विभाग के पास शिकायतें और सीएमओ की जांच रिपोर्टें मौजूद होने के बावजूद, अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। उल्टे मामले को दबाने की कोशिशों ने भ्रष्टाचार की बू को और गहरा कर दिया है।
भर्ती में गड़बड़ी का खेल
टेक्नीशियन भर्ती की प्रक्रिया का मकसद अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर योग्य कर्मचारियों की नियुक्ति था, ताकि मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके। लेकिन भर्ती प्रक्रिया में जिस तरह से अनियमितताएं सामने आईं, उसने पूरे सिस्टम की सच्चाई उजागर कर दी।
कुछ उम्मीदवारों की मेरिट संदिग्ध पाई गई।
कई नियुक्तियों में फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र और अनुभव पत्र का इस्तेमाल हुआ।
नियमों के खिलाफ जाकर पसंदीदा लोगों का चयन किया गया।
इन अनियमितताओं के चलते मरीजों की जिंदगी सीधे खतरे में पड़ी। अस्पतालों में ऐसे लोग तकनीकी कामों पर तैनात कर दिए गए जिनकी योग्यता संदिग्ध थी।
अमर उजाला की पड़ताल में खुलासा
अमर उजाला की पड़ताल के अनुसार 79 जिलों से भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतें दर्ज हुईं। इनमें से 140 नियुक्तियां संदिग्ध पाई गईं। कई जिलों के सीएमओ ने इस बारे में अपनी रिपोर्ट तैयार कर शासन और महानिदेशालय को भेजी।
लेकिन रिपोर्टों पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। न जांच तेज हुई और न ही दोषियों को चिन्हित कर कार्रवाई की गई। उल्टे कई मामलों को दबा दिया गया।
केस 1: गोंडा
गोंडा जिले के सीएमओ ने वर्ष 2017 में एक रिपोर्ट शासन को भेजी थी। रिपोर्ट में साफ लिखा गया था कि तकनीशियन भर्ती में गंभीर गड़बड़ी हुई है। नियुक्ति के समय कई उम्मीदवारों के दस्तावेज संदिग्ध पाए गए। बावजूद इसके रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं हुई।
केस 2: आजमगढ़
आजमगढ़ जिले में 2018 में भी यही खेल दोहराया गया। सीएमओ ने शासन को रिपोर्ट भेजकर कहा कि तकनीशियन भर्ती में फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्तियां हुई हैं। लेकिन विभाग ने इस रिपोर्ट को भी दरकिनार कर दिया।
विभाग पर उठ रहे सवाल
इन मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जिलों से जांच रिपोर्ट आई थीं, तो उन्हें दबा क्यों दिया गया?
क्या विभाग में बैठे बड़े अधिकारी भ्रष्टाचारियों को बचा रहे हैं?
क्या योग्य उम्मीदवारों का हक जानबूझकर छीना गया?
और क्या मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले लोगों को सुरक्षित पनाह दी जा रही है?
महानिदेशालय की चुप्पी
स्वास्थ्य महानिदेशालय के पास इन मामलों की पूरी जानकारी है। रिपोर्टें उनके पास वर्षों से लंबित हैं। मगर चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक किसी एक भी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाया गया।
जांच के नाम पर फाइलें इधर-उधर घूमती रहीं, लेकिन कार्रवाई ठप रही। यही कारण है कि फर्जीवाड़े की शिकायतें लगातार बढ़ती गईं और सिस्टम का भरोसा कमजोर होता गया।
मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़
तकनीशियन भर्ती सिर्फ एक नौकरी का मामला नहीं है, बल्कि सीधे मरीजों की जिंदगी से जुड़ा है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में टेक्नीशियन की जिम्मेदारी अत्यंत संवेदनशील होती है।
वे एक्स-रे, लैब टेस्ट और अन्य महत्वपूर्ण मेडिकल जांच करते हैं।
रिपोर्ट की सही और सटीकता पर मरीज का इलाज निर्भर करता है।
अगर तकनीशियन ही अयोग्य या फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी पाए होंगे, तो मरीज की जान सीधा खतरे में होगी।
यानी भर्ती घोटाला केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य से खिलवाड़ है।
जनाक्रोश और पारदर्शिता की मांग
जब यह मामला सामने आया, तो लोगों में आक्रोश बढ़ा। योग्य उम्मीदवारों ने भी सवाल उठाए कि आखिर वे लोग कब तक अपने हक से वंचित रहेंगे।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस भर्ती घोटाले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और फर्जी नियुक्तियां रद्द की जानी चाहिए।
अब तक क्या हुआ?
2008 से 2016 तक भर्ती प्रक्रियाओं में गड़बड़ी की शिकायतें दर्ज।
79 जिलों से 140 नियुक्तियां संदिग्ध पाई गईं।
सीएमओ की रिपोर्ट शासन और महानिदेशालय को भेजी गई।
कार्रवाई की जगह रिपोर्टों को दबा दिया गया।
मरीजों की जान से खिलवाड़ करने वाले टेक्नीशियन आज भी ड्यूटी पर तैनात।
निष्कर्ष
तकनीशियन भर्ती घोटाले ने स्वास्थ्य विभाग की साख पर गहरा धब्बा लगा दिया है। यह मामला केवल भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि जनता के जीवन से जुड़े संवेदनशील विषय का है। अगर फर्जी दस्तावेजों पर नियुक्त हुए लोग मरीजों की जांच करेंगे तो परिणाम कितना खतरनाक हो सकता है, इसकी कल्पना भी भयावह है।