अपना घर मौलिक अधिकार का ही एक पहलू : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि “अपना घर होना केवल एक कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन जीने का अभिन्न हिस्सा है।” न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारत के शहरी भविष्य में घर खरीदने वालों के हितों की रक्षा करना सरकार और संबंधित संस्थाओं का संवैधानिक दायित्व है।
पुनरुद्धार कोष बनाने का सुझाव
पीठ ने कहा कि सरकार केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती। उसे ठोस कदम उठाने होंगे ताकि घर खरीददारों के साथ धोखाधड़ी और शोषण न हो। इसके लिए कोर्ट ने केंद्र को सुझाव दिया कि एक “पुनरुद्धार कोष” (Revival Fund) बनाया जाए। इस कोष का उद्देश्य होगा कि अगर किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में निवेशकों के पैसे फंस जाते हैं, तो इस कोष से उन्हें राहत मिल सके।
एनआरसीसीएल की तर्ज पर निकाय कॉर्पोरेट
कोर्ट ने केंद्र राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लिमिटेड (NARCL) का उदाहरण देते हुए कहा कि इसी तर्ज पर एक रियल एस्टेट/निर्माण-केन्द्रित सार्वजनिक निकाय बनाया जा सकता है।
- यह निकाय निजी और सार्वजनिक साझेदारी के आधार पर काम कर सकता है।
- दिवालिया और दिवालियापन संहिता (IBC) के अंतर्गत फंसे हुए प्रोजेक्ट्स को खरीदकर उन्हें पूरा कराएगा।
- इस तरह से करोड़ों निवेशकों की मेहनत की कमाई सुरक्षित रह सकेगी।
शहरीकरण और बढ़ती मांग
कोर्ट ने दोहराया कि देश में तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है। गाँवों से लोग शहरों की ओर आ रहे हैं, जिससे आवास की मांग बहुत अधिक बढ़ रही है।
- अगर कोई व्यक्ति अपनी जीवनभर की कमाई से घर खरीदता है और धोखाधड़ी का शिकार होता है, तो यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं बल्कि उसके मौलिक अधिकार का हनन भी है।
- इसलिए सरकार और संस्थाओं का दायित्व है कि ऐसी परिस्थितियों में प्रभावी समाधान निकाला जाए।
रेरा (RERA) को दंतविहीन न बनाया जाए
सुप्रीम कोर्ट ने रेरा (Real Estate Regulatory Authority) को लेकर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि रेरा को केवल नाम का संगठन न बनाया जाए, बल्कि उसे इतने अधिकार मिलने चाहिए कि वह
- खरीदारों को न्याय दिला सके,
- बिल्डरों पर कठोर कार्यवाही कर सके,
- और यह सुनिश्चित कर सके कि कोई भी डेवलपर घर खरीददारों के साथ धोखाधड़ी या शोषण न कर पाए।
संवैधानिक जिम्मेदारी
कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि आम नागरिकों को सम्मानजनक और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराया जाए।
- यह केवल आर्थिक या सामाजिक पहलू नहीं बल्कि मौलिक अधिकार है।
- यदि नागरिक को सुरक्षित घर नहीं मिलता, तो उसके जीवन के अनेक पहलू प्रभावित होते हैं—शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा।
सारांश
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि भारत में घर खरीदना केवल एक सौदा नहीं बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार का हिस्सा है। सरकार को चाहिए कि वह आवास क्षेत्र में कड़े कदम उठाए, पुनरुद्धार कोष बनाए और रेरा को मज़बूत करे ताकि आम नागरिकों का विश्वास बहाल रहे और हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन के लिए अपना घर मिल सके